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क्या टोटेमवाद एक वास्तविकता है? लेवी-स्ट्रॉस के लेखनों के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

टोटेमवाद की वास्तविकता को लेवी-स्ट्रॉस के लेखनों के संदर्भ में समझना एक जटिल कार्य है, क्योंकि लेवी-स्ट्रॉस ने टोटेमवाद को एक विशिष्ट धर्म या सामाजिक संरचना के बजाय, मानव मन की एक सार्वभौमिक वर्गीकरण प्रणाली के रूप में व्याख्या किया। उन्होंने टोटेमवाद के पारंपरिक समाजशास्त्रीय और नृवंशविज्ञान संबंधी दृष्टिकोणों को चुनौती दी।

लेवी-स्ट्रॉस और टोटेमवाद पर पारंपरिक दृष्टिकोण की आलोचना:

19वीं और 20वीं सदी के शुरुआती नृवंशविज्ञानियों और समाजशास्त्रियों, जैसे कि दुर्खीम और फ्रेज़र, ने टोटेमवाद को एक विशिष्ट सामाजिक और धार्मिक घटना के रूप में देखा था।

  • दुर्खीम: ने टोटेमवाद को धर्म के सबसे आदिम रूप के रूप में वर्णित किया, जहां एक कबीला एक जानवर या पौधे (टोटेम) को पवित्र मानता है, जो उनके समूह का प्रतीक होता है। उनके लिए, टोटेमवाद सामाजिक एकजुटता और सामूहिक चेतना का आधार था। टोटेम स्वयं कबीले की सामाजिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता था।
  • फ्रेज़र: ने टोटेमवाद को जादू और धर्म के मिश्रण के रूप में देखा, जिसमें अलौकिक शक्तियों और निषेधों की एक प्रणाली शामिल थी।

लेवी-स्ट्रॉस ने अपनी कृति "टोटेमिज्म" (Totemism, 1962) और "द सैवेज माइंड" (The Savage Mind, 1962) में इन पारंपरिक विचारों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने तर्क दिया कि टोटेमवाद एक भ्रम है – एक ऐसी अवधारणा जिसे पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने विभिन्न संस्कृतियों में बिखरी हुई, असंबंधित विशेषताओं को एक साथ समूहित करके गढ़ा है। उनके लिए, टोटेमवाद के नाम पर जो कुछ भी अध्ययन किया गया है, वह वास्तव में मानव मन की गहरी संरचनाओं का प्रकटीकरण है, न कि कोई अद्वितीय सामाजिक-धार्मिक प्रणाली।

लेवी-स्ट्रॉस का संरचनात्मक दृष्टिकोण:

लेवी-स्ट्रॉस संरचनावाद के अग्रणी थे, और उन्होंने मानव संस्कृति को भाषा की तरह एक संरचित प्रणाली के रूप में देखा। उनके अनुसार, मानव मन द्वंद्वात्मक विरोधों (binary oppositions) के माध्यम से दुनिया को व्यवस्थित करता है, जैसे कि प्रकृति बनाम संस्कृति, कच्चा बनाम पका हुआ, जीवन बनाम मृत्यु। टोटेमवाद इसी तरह की एक मानसिक वर्गीकरण प्रणाली का बाहरी प्रकटीकरण है।

1. टोटेमवाद एक "अच्छा सोचने का माध्यम" (Good to Think) है: लेवी-स्ट्रॉस का केंद्रीय तर्क यह था कि टोटेमवाद आदिम समाजों के लिए एक वर्गीकरण प्रणाली के रूप में कार्य करता है। यह विशिष्ट सामाजिक समूहों और प्राकृतिक प्रजातियों (जानवरों या पौधों) के बीच समानता (homology) स्थापित करने का एक तरीका है। यह एक प्रतीकात्मक प्रणाली है जो समाज को अपने सदस्यों और पर्यावरण के बीच संबंधों को समझने और व्यवस्थित करने में मदद करती है।

  • उदाहरण के लिए, यदि एक कबीला खुद को बाज टोटेम से जोड़ता है, और दूसरा कबीला खुद को कोयोट टोटेम से जोड़ता है, तो यह केवल इसलिए नहीं है कि वे बाज या कोयोट की पूजा करते हैं। बल्कि, यह बाज और कोयोट के बीच के प्राकृतिक अंतरों (जैसे उनकी शिकार करने की शैली, निवास स्थान) का उपयोग करके उन दो मानव समूहों के बीच के सामाजिक अंतरों (जैसे उनके सामाजिक संगठन, भूमिकाएं) को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करने का एक तरीका है।
  • इसलिए, टोटेमवाद वस्तुओं (जानवरों या पौधों) और समूहों के बीच एक सीधा संबंध नहीं है, बल्कि यह उनके बीच के संबंधों की एक सादृश्यता (analogy of relations) है।

2. मानसिक संरचनाएं, बाहरी वास्तविकता नहीं: लेवी-स्ट्रॉस के लिए, टोटेमवाद की "वास्तविकता" बाहरी दुनिया में नहीं है, बल्कि मानव मन की आंतरिक, अचेतन संरचनाओं में है। मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से पैटर्न, अंतर और समानताएं ढूंढता है। टोटेमवाद इस सार्वभौमिक मानसिक प्रक्रिया का एक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है।

  • वह इस बात पर जोर देते हैं कि टोटेमवाद कोई धार्मिक विश्वास नहीं है जिसमें एक टोटेम को पवित्र माना जाता है और उसकी पूजा की जाती है। इसके बजाय, यह प्रकृति की वस्तुओं का उपयोग सामाजिक संबंधों, नियमों और पहचान को वर्गीकृत करने और संप्रेषित करने के लिए करता है।

3. टोटेमवाद और बहिर्विवाह (Exogamy): पारंपरिक दृष्टिकोणों ने अक्सर टोटेमवाद को बहिर्विवाह (अपने टोटेम समूह के बाहर विवाह) से जोड़ा। लेवी-स्ट्रॉस ने इसे भी संरचनात्मक रूप से समझाया। उनके लिए, बहिर्विवाह भी द्वंद्वात्मक विरोधों (अपने समूह बनाम दूसरे समूह) और संबंधों के आदान-प्रदान (विवाह के माध्यम से संबंध स्थापित करना) का एक हिस्सा है, जो सामाजिक संरचनाओं को बनाए रखता है।

4. "सैवेज माइंड" की तार्किकता: "द सैवेज माइंड" में, लेवी-स्ट्रॉस ने तथाकथित "आदिम" लोगों की सोच की तार्किकता पर जोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि आदिम लोग वैज्ञानिक सोच में अक्षम नहीं थे, बल्कि वे अलग तरीके से सोचते थे – जिसे उन्होंने "ठोस का विज्ञान" (science of the concrete) कहा। टोटेमवाद इसी "ठोस के विज्ञान" का एक उदाहरण है, जहां लोग अपने आसपास की प्राकृतिक दुनिया की विशिष्ट, संवेदी गुणों का उपयोग करके अमूर्त सामाजिक अवधारणाओं को समझते और व्यवस्थित करते हैं।

तो, क्या टोटेमवाद एक वास्तविकता है?

लेवी-स्ट्रॉस के दृष्टिकोण से, "टोटेमवाद" एक वास्तविकता नहीं है यदि इसे एक अद्वितीय, वैश्विक सामाजिक-धार्मिक संस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है। इसके बजाय, यह कई विशिष्ट और विविध सांस्कृतिक प्रथाओं का एक पश्चिमी निर्माण है।

हालांकि, टोटेमवाद की "वास्तविकता" इस अर्थ में मौजूद है कि यह मानव मन की वर्गीकरण और प्रतीकात्मकता की सार्वभौमिक क्षमता का एक अभिव्यक्ति है। जिन प्रथाओं को "टोटेमवाद" के रूप में लेबल किया गया है, वे वास्तव में मानव समूहों के लिए अपने सामाजिक और प्राकृतिक वातावरण को समझने, वर्गीकृत करने और उनके साथ बातचीत करने के तरीके हैं। वे विभिन्न सांस्कृतिक संदर्भों में उत्पन्न होने वाली बौद्धिक संरचनाओं को दर्शाती हैं, जो द्वंद्वात्मक विरोधों के माध्यम से दुनिया को व्यवस्थित करती हैं।

संक्षेप में, लेवी-स्ट्रॉस के लिए:

  • टोटेमवाद एक विशिष्ट 'चीज' नहीं है जो समाजों में मौजूद है।
  • यह एक विश्लेषणात्मक उपकरण है जिसके माध्यम से मानव मन अपनी दुनिया को वर्गीकृत और प्रतीकात्मक रूप से व्यवस्थित करता है।
  • यह मानव मन की सार्वभौमिक संरचनाओं का प्रकटीकरण है, जो विभिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में दिखायी देती है।

इसलिए, लेवी-स्ट्रॉस ने टोटेमवाद को एक नृवंशविज्ञान संबंधी वस्तु के बजाय एक दार्शनिक और संज्ञानात्मक अवधारणा के रूप में पुनः परिभाषित किया। यह अब विशिष्ट विश्वासों और अनुष्ठानों का एक सेट नहीं है, बल्कि एक व्यापक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है जो प्राकृतिक और सामाजिक दुनिया के बीच संबंधों को समझने और व्यक्त करने के लिए सांस्कृतिक सामग्री का उपयोग करती है।

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