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समाज में धर्म के भविष्य पर पीटर बर्जर के दृष्टिकोण की चर्चा कीजिए।

पीटर बर्जर (Peter L. Berger), एक प्रमुख समाजशास्त्री, ने समाज में धर्म के भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अपने शुरुआती कामों में, विशेष रूप से "द सेक्रेड कैनोपी: एलिमेंट्स ऑफ ए सोशियोलॉजिकल थ्योरी ऑफ रिलीजन" (The Sacred Canopy: Elements of a Sociological Theory of Religion, 1967) में, बर्जर ने धर्मनिरपेक्षीकरण (secularization) के विचार का समर्थन किया। हालांकि, अपने बाद के लेखन में, उन्होंने अपने कुछ पहले के विचारों पर पुनर्विचार किया और धर्म की निरंतर प्रासंगिकता और नए रूपों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया।

शुरुआती विचार: धर्मनिरपेक्षीकरण और "पवित्र चंदवा" का ह्रास: अपने शुरुआती काम में, बर्जर ने तर्क दिया कि आधुनिकता धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया की ओर ले जाती है, जो कि समाज में धार्मिक संस्थानों और विश्वासों के प्रभाव में गिरावट है। उनके लिए, पूर्व-आधुनिक समाजों को एक "पवित्र चंदवा" द्वारा चिह्नित किया गया था - एक सर्वव्यापी धार्मिक विश्वदृष्टि जो ब्रह्मांड को अर्थ और व्यवस्था प्रदान करती थी। यह चंदवा समाज और व्यक्तिगत जीवन के सभी पहलुओं को समाहित करती थी, जिससे एक मजबूत नैतिक और अस्तित्वगत ढांचा मिलता था।

हालांकि, आधुनिकीकरण के साथ, बर्जर ने तर्क दिया कि यह पवित्र चंदवा बिखरने लगी। इस प्रक्रिया के मुख्य कारक थे:

  • विविधीकरण (Pluralism): आधुनिक समाज में विभिन्न धार्मिक और गैर-धार्मिक विश्वदृष्टि का सह-अस्तित्व होता है। जब व्यक्ति कई प्रतिस्पर्धी सत्य-दावों का सामना करते हैं, तो धार्मिक विश्वासों की निरपेक्षता और स्व-स्पष्टता कम हो जाती है। अब कोई एक स्वीकृत धार्मिक सच्चाई नहीं है, जिससे व्यक्ति अपनी आस्था की व्यक्तिगत पसंद और "बाजार" के दृष्टिकोण की ओर बढ़ते हैं।
  • निजीकरण (Privatization): धर्म सार्वजनिक क्षेत्र से हटकर व्यक्तिगत अनुभव का मामला बन जाता है। चर्चों और धार्मिक संस्थानों का सामाजिक प्रभाव कम हो जाता है, और धर्म मुख्य रूप से व्यक्तिगत नैतिकता, अर्थ और पहचान की खोज के लिए एक निजी मामला बन जाता है।
  • तर्कसंगतता (Rationalization): विज्ञान और तर्क के उदय ने धार्मिक स्पष्टीकरणों की वैधता को चुनौती दी। प्राकृतिक दुनिया को समझने के लिए वैज्ञानिक तरीकों का प्रभुत्व धार्मिक व्याख्याओं की आवश्यकता को कम करता है।

बर्जर ने भविष्यवाणी की थी कि जैसे-जैसे धर्मनिरपेक्षीकरण जारी रहेगा, धर्म धीरे-धीरे समाज के हाशिए पर चला जाएगा और आधुनिक जीवन में अपनी केंद्रीय भूमिका खो देगा। उन्होंने एक ऐसे भविष्य की कल्पना की जहां धर्म ज्यादातर निजी दायरे तक ही सीमित रहेगा, और सार्वजनिक क्षेत्र में बहुत कम प्रासंगिकता रखेगा।

बाद के विचार: धर्मनिरपेक्षीकरण की "मिथक" और "अधार्मिकीकरण": 2000 के दशक की शुरुआत में, बर्जर ने अपने पहले के विचारों पर पुनर्विचार करना शुरू किया। उन्होंने तर्क दिया कि धर्मनिरपेक्षीकरण का विचार, जैसा कि पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्सों में देखा गया था, वास्तव में एक विश्वव्यापी घटना नहीं थी। उन्होंने अपने निबंध "द एम्बैरसमेंट ऑफ सोशियोलॉजी" और अन्य कार्यों में स्वीकार किया कि धर्मनिरपेक्षीकरण के बारे में उनकी और अन्य समाजशास्त्रियों की प्रारंभिक भविष्यवाणियां काफी हद तक गलत थीं।

बर्जर ने कहा कि पश्चिमी यूरोप को छोड़कर, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में धर्म की गिरावट नहीं देखी गई थी। बल्कि, कई क्षेत्रों में, धर्म का पुनरुत्थान और विकास हो रहा था। उन्होंने "अधार्मिकीकरण" (desecularization) की अवधारणा पेश की, जिसका अर्थ है धर्म का पुनरुत्थान और सार्वजनिक क्षेत्र में इसकी बढ़ती प्रासंगिकता।

उनके पुनर्विचार के मुख्य बिंदु थे:

  • विश्वव्यापी घटना नहीं: बर्जर ने स्वीकार किया कि धर्मनिरपेक्षीकरण मुख्य रूप से पश्चिमी यूरोप तक ही सीमित था और इसे वैश्विक प्रवृत्ति के रूप में सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता था। संयुक्त राज्य अमेरिका सहित दुनिया के कई अन्य हिस्सों में, धर्म मजबूत बना हुआ था और यहां तक कि बढ़ भी रहा था।
  • धार्मिक विविधता और कट्टरता: उन्होंने नोट किया कि धर्म का भविष्य केवल इसकी गिरावट का मामला नहीं है, बल्कि धार्मिक विविधता में वृद्धि और, कुछ मामलों में, धार्मिक कट्टरता का भी है। वैश्वीकरण और प्रवासन ने विभिन्न धार्मिक परंपराओं को एक साथ लाया है, जिससे धार्मिक बाजार अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी हो गया है।
  • सामाजिक संकट और धर्म की भूमिका: बर्जर ने यह भी माना कि आधुनिकता के तनाव और संकट, जैसे कि पहचान का नुकसान, परमाणुकरण और सामाजिक टूटना, धर्म के लिए एक नया अवसर प्रदान कर सकते हैं। धर्म इन संकटों के सामने अर्थ, समुदाय और नैतिक दिशा प्रदान कर सकता है।
  • निजी बनाम सार्वजनिक धर्म: उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि धर्म के सार्वजनिक और निजी आयामों को अलग करना मुश्किल है। यहां तक कि जब धर्म निजी विश्वास का मामला बन जाता है, तब भी यह सार्वजनिक नीति, सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक प्रवचन को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष: पीटर बर्जर के दृष्टिकोण ने समाज में धर्म के भविष्य के बारे में समाजशास्त्रीय सोच को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके शुरुआती विचारों ने धर्मनिरपेक्षीकरण के सिद्धांत को मजबूत किया, यह सुझाव देते हुए कि आधुनिकीकरण अनिवार्य रूप से धर्म के प्रभाव में गिरावट लाएगा। हालांकि, उनके बाद के कार्यों ने इस दृष्टिकोण को काफी हद तक संशोधित किया, यह तर्क देते हुए कि धर्मनिरपेक्षीकरण एक सार्वभौमिक प्रक्रिया नहीं है और वास्तव में, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में धर्म एक जीवंत और अक्सर बढ़ती हुई शक्ति बनी हुई है।

बर्जर के लिए, धर्म का भविष्य जटिल और बहुमुखी है। यह केवल निरंतर गिरावट का मार्ग नहीं है, बल्कि पुनरुत्थान, अनुकूलन और परिवर्तन का भी है। धर्म आधुनिक दुनिया की चुनौतियों का जवाब देने और अर्थ, समुदाय और पहचान की मानव आवश्यकता को पूरा करने के नए तरीके खोज सकता है। उनका काम हमें याद दिलाता है कि धर्म केवल एक अवशेष नहीं है जो गायब हो जाएगा, बल्कि मानव अनुभव का एक स्थायी और गतिशील पहलू है जो आधुनिक समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और भविष्य में भी निभाता रहेगा, हालांकि संभवतः नए और अप्रत्याशित रूपों में।

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