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1980 के दशक के बाद भारतीय उत्प्रवास (Indian emigration) के पैटर्न क्या हैं?

1980 के दशक के बाद भारतीय उत्प्रवास के पैटर्न

1980 के दशक के बाद भारतीय उत्प्रवास के पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जो भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों में व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को दर्शाते हैं। यदि प्रारंभिक उत्प्रवासन मुख्य रूप से औपनिवेशिक काल के दौरान वृक्षारोपण और खदानों में काम करने वाले गिरमिटिया मजदूरों द्वारा चिह्नित था, और फिर 1970 के दशक तक खाड़ी देशों में तेल बूम द्वारा संचालित हुआ, तो 1980 के दशक के बाद का काल एक नए, अधिक विविध और उच्च-कुशल प्रवासन के उदय का गवाह बना।

1980 के दशक के बाद भारतीय उत्प्रवास के प्रमुख पैटर्न:

1. गंतव्य देशों का विविधीकरण (Diversification of Destination Countries):

  • जबकि खाड़ी क्षेत्र एक महत्वपूर्ण गंतव्य बना हुआ है, 1980 के दशक के बाद से भारतीय प्रवासियों ने पारंपरिक पश्चिमी देशों (जैसे यूके, यूएसए, कनाडा) के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, यूरोप के विभिन्न देश और यहां तक कि दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में भी प्रवास करना शुरू कर दिया है।
  • यह उन देशों में आर्थिक अवसरों, अनुकूल आव्रजन नीतियों और तकनीकी क्रांति के विकास से प्रेरित था।

2. उच्च-कुशल और पेशेवर प्रवासन का उदय (Rise of High-Skilled and Professional Migration):

  • यह 1980 के दशक के बाद का सबसे महत्वपूर्ण पैटर्न है। भारत की बढ़ती शिक्षा प्रणाली ने बड़ी संख्या में इंजीनियरों, डॉक्टरों, वैज्ञानिकों, आईटी पेशेवरों और प्रबंधन विशेषज्ञों का उत्पादन किया।
  • यूएसए (H-1B वीजा कार्यक्रम के माध्यम से), कनाडा, यूके और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में इन पेशेवरों की उच्च मांग ने भारतीय "ब्रेन ड्रेन" को बढ़ावा दिया, जहां अत्यधिक शिक्षित भारतीय बेहतर अवसरों और जीवन की गुणवत्ता की तलाश में प्रवास कर रहे थे।
  • यह प्रवासन अब "ब्रेन ड्रेन" के बजाय "ब्रेन गेन" या "ब्रेन सर्कुलेशन" के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि प्रवासी भारत को प्रेषण, निवेश और ज्ञान हस्तांतरण के माध्यम से लाभ पहुंचाते हैं।

3. आईटी पेशेवरों का प्रभुत्व (Dominance of IT Professionals):

  • विशेष रूप से 1990 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत में, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में भारतीय पेशेवरों का उत्प्रवास एक प्रमुख विशेषता बन गया। सिलिकॉन वैली और अन्य वैश्विक आईटी हब में भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स की बड़ी संख्या देखी गई।
  • यह वैश्विक तकनीकी क्रांति और भारत की आईटी सेवाओं के निर्यात में वृद्धि के साथ जुड़ा हुआ था।

4. पारिवारिक पुनर्मिलन और स्थायी प्रवासन (Family Reunification and Permanent Migration):

  • खाड़ी प्रवासन के अस्थायी प्रकृति के विपरीत, पश्चिमी देशों में भारतीय प्रवासन में अक्सर स्थायी निवास या नागरिकता प्राप्त करने का इरादा शामिल होता है।
  • एक बार जब प्राथमिक प्रवासी बस जाते हैं, तो वे अक्सर अपने परिवारों (जीवनसाथी, बच्चों, माता-पिता) को परिवार पुनर्मिलन कार्यक्रमों के माध्यम से अपने साथ लाते हैं, जिससे बड़े और स्थापित प्रवासी समुदाय बनते हैं।

5. महिला प्रवासन में वृद्धि (Increase in Female Migration):

  • पहले की तुलना में, 1980 के दशक के बाद महिला प्रवासियों की संख्या में वृद्धि हुई है। यह या तो परिवार पुनर्मिलन के माध्यम से हो सकता है या स्वतंत्र रूप से काम करने वाली पेशेवर महिलाओं के रूप में (जैसे नर्स, डॉक्टर, आईटी पेशेवर)।
  • यह भारतीय समाज में महिलाओं की बढ़ती शिक्षा और सशक्तिकरण को दर्शाता है।

6. छात्र प्रवासन में वृद्धि (Rise in Student Migration):

  • भारत दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय छात्र प्रदाताओं में से एक बन गया है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्र बड़ी संख्या में यूएसए, यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में जा रहे हैं।
  • अक्सर, ये छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन देशों में रोजगार के अवसर तलाशते हैं, जिससे वे स्थायी प्रवासियों में बदल जाते हैं।

7. उद्यमिता और निवेश (Entrepreneurship and Investment):

  • भारतीय डायस्पोरा ने मेजबान देशों में और भारत में भी उद्यमिता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई भारतीय प्रवासियों ने सफल व्यवसाय शुरू किए हैं, विशेष रूप से तकनीकी और सेवा क्षेत्रों में।
  • वे भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और उद्यम पूंजी के स्रोत भी बन गए हैं।

8. भारतीय राज्यों से विविध स्रोत (Diverse Source States within India):

  • जबकि दक्षिण भारतीय राज्य (केरल, तमिलनाडु) खाड़ी प्रवासन में प्रमुख रहे हैं, उच्च-कुशल प्रवासन में महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, आंध्र प्रदेश (और तेलंगाना), कर्नाटक और दिल्ली जैसे राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हैं।
  • उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से भी उत्प्रवास बढ़ रहा है, खासकर खाड़ी और अन्य एशियाई देशों में।

9. प्रेषण का बढ़ता महत्व (Growing Importance of Remittances):

  • भारतीय डायस्पोरा, चाहे वे कहीं भी हों, भारत में अपने परिवारों को प्रेषण भेजना जारी रखते हैं। 1980 के दशक के बाद से प्रेषण की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है।

10. ज्ञान, प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक हस्तांतरण (Knowledge, Technology, and Cultural Transfer):

  • प्रवासी अपने साथ न केवल पैसा, बल्कि ज्ञान, कौशल, प्रौद्योगिकी और नए विचारों को भी भारत वापस लाते हैं। यह भारत के विकास और वैश्वीकरण में योगदान देता है।
  • वे अपनी मेजबान संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति, व्यंजनों और परंपराओं का भी प्रसार करते हैं, जिससे एक समृद्ध सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है।

निष्कर्ष:

1980 के दशक के बाद भारतीय उत्प्रवास का पैटर्न मात्रा और गुणवत्ता दोनों में बदल गया है। यह मुख्य रूप से उच्च-कुशल पेशेवरों और छात्रों के पश्चिमी देशों की ओर बढ़ने, गंतव्य देशों के विविधीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और स्थायी प्रवासन की प्रवृत्ति की विशेषता है। यह बदलाव भारत की आर्थिक उदारीकरण, शिक्षा क्षेत्र के विस्तार और वैश्विक श्रम बाजार की बदलती मांगों का परिणाम है। यह भारतीय डायस्पोरा को दुनिया के सबसे गतिशील और प्रभावशाली प्रवासी समूहों में से एक बनाता है।

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