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धर्म की प्रकार्यात्मक व्याख्या की चर्चा कीजिए।

धर्म की प्रकार्यात्मक व्याख्या, जिसे अक्सर एमिल दुर्खीम (Emile Durkheim) के काम से जोड़ा जाता है, समाज में धर्म द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं और कार्यों पर केंद्रित है। यह दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि धर्म समाज की स्थिरता, एकजुटता और निरंतरता में कैसे योगदान देता है। प्रकार्यवादियों के लिए, धर्म केवल विश्वासों और प्रथाओं का एक समूह नहीं है, बल्कि एक आवश्यक सामाजिक संस्था है जो विभिन्न महत्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करती है।

सामाजिक एकजुटता और एकता: दुर्खीम का मानना था कि धर्म सामाजिक एकजुटता और एकता का एक प्रमुख स्रोत है। उन्होंने पवित्र (sacred) और अपवित्र (profane) की अवधारणा को विकसित किया, यह तर्क देते हुए कि समाज पवित्र वस्तुओं, स्थानों या विचारों को अलग करता है और उन्हें विशेष महत्व देता है। ये पवित्र वस्तुएं वास्तव में स्वयं समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो उन साझा मूल्यों और आदर्शों को दर्शाती हैं जिनके लिए समाज खड़ा है। जब लोग धार्मिक अनुष्ठानों और समारोहों में भाग लेते हैं, तो वे एक सामूहिक अनुभव में भाग लेते हैं जो उन्हें एक समुदाय के रूप में अपनी सदस्यता की पुष्टि करने की अनुमति देता है। यह "सामूहिक उत्साह" की भावना पैदा करता है जो व्यक्तियों को एकजुट करता है और उनके साझा पहचान को मजबूत करता है। उदाहरण के लिए, एक धार्मिक त्योहार या एक सामूहिक प्रार्थना अनुष्ठान व्यक्तियों को एक साथ लाता है, उनके सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है और समुदाय की भावना पैदा करता है।

सामाजिक नियंत्रण और नैतिकता: धर्म सामाजिक नियंत्रण के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में भी कार्य करता है। यह नैतिक संहिता, मूल्य और मानदंड स्थापित करता है जो सदस्यों के व्यवहार को निर्देशित करते हैं। धार्मिक शिक्षाएं अक्सर सही और गलत, अच्छे और बुरे के बारे में नियम निर्धारित करती हैं, जो सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में मदद करती हैं। ये नियम न केवल कानूनी प्रतिबंधों के माध्यम से, बल्कि आंतरिक नैतिक दायित्वों और अलौकिक परिणामों के डर से भी लागू होते हैं (जैसे कि नरक में जाने का डर या दिव्य न्याय का सामना करना)। उदाहरण के लिए, कई धर्म चोरी, हत्या या व्यभिचार को पाप के रूप में निंदा करते हैं, जिससे इन कृत्यों को हतोत्साहित किया जाता है और एक स्थिर सामाजिक वातावरण को बढ़ावा मिलता है। यह व्यक्तियों को सामाजिक रूप से स्वीकार्य तरीके से व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे संघर्ष कम होता है और सहयोग बढ़ता है।

अर्थ और उद्देश्य प्रदान करना: धर्म व्यक्तियों को जीवन के सबसे मौलिक प्रश्नों के उत्तर प्रदान करके अर्थ और उद्देश्य की भावना प्रदान करता है: हम यहाँ क्यों हैं? मृत्यु के बाद क्या होता है? पीड़ा का क्या अर्थ है? यह दृष्टिकोण दुनिया को समझने और ब्रह्मांड में अपनी जगह खोजने के लिए एक ढांचा प्रदान करता है। संकट, दुख या मृत्यु का सामना करते समय, धर्म व्यक्तियों को आराम, आशा और एक ऐसा ढांचा प्रदान करता है जिसके भीतर वे अपनी पीड़ा को समझ सकते हैं। यह उन्हें जीवन की अनिश्चितताओं से निपटने में मदद करता है और उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए मनोवैज्ञानिक शक्ति देता है। उदाहरण के लिए, मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास शोक संतप्त लोगों को सांत्वना दे सकता है और उन्हें नुकसान की भावना से निपटने में मदद कर सकता है।

अनुकूलन और परिवर्तन को बढ़ावा देना: जबकि धर्म अक्सर स्थिरता से जुड़ा होता है, यह सामाजिक अनुकूलन और परिवर्तन को बढ़ावा देने में भी भूमिका निभा सकता है। कुछ धार्मिक आंदोलन सामाजिक अन्याय को चुनौती देने और सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ाने में सहायक रहे हैं। मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहां धार्मिक विश्वासों और संगठनों ने सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रेरणा और संगठनात्मक आधार प्रदान किया। धर्म नई नैतिकताओं और मूल्यों को जन्म दे सकता है जो बदलते सामाजिक वातावरण के अनुकूल होते हैं, जिससे समाज को नई चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलती है।

आलोचनाएँ: प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण की कई आलोचनाएँ की गई हैं:

  • धर्म के नकारात्मक पहलुओं की उपेक्षा: यह दृष्टिकोण धर्म के दमनकारी या संघर्ष-प्रेरक पहलुओं को नजरअंदाज करता है, जैसे धार्मिक उत्पीड़न, युद्ध या कट्टरता। यह इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करता कि धर्म कैसे सामाजिक असमानता को बनाए रख सकता है।
  • समाज के लिए धर्म की आवश्यकता पर अति-जोर: आलोचकों का तर्क है कि प्रकार्यवाद यह सुझाव देता है कि समाज को कार्य करने के लिए धर्म की आवश्यकता है, जबकि कई आधुनिक धर्मनिरपेक्ष समाज बिना पारंपरिक धार्मिक संरचनाओं के सफलतापूर्वक कार्य करते हैं।
  • धर्म की आंतरिक गतिशीलता की उपेक्षा: यह धर्म को मुख्य रूप से एक सामाजिक उपकरण के रूप में देखता है, इसके आंतरिक अर्थ, आध्यात्मिक अनुभव और व्यक्तिगत विश्वासों की जटिलता को अनदेखा करता है।
  • साक्ष्य की कमी: कुछ आलोचक इस बात पर सवाल उठाते हैं कि दुर्खीम के सिद्धांतों को अनुभवजन्य रूप से कैसे सत्यापित किया जा सकता है, खासकर प्राचीन समाजों के बारे में उनके दावों के संबंध में।

निष्कर्ष: धर्म की प्रकार्यात्मक व्याख्या समाजशास्त्र में धर्म के अध्ययन के लिए एक मौलिक और प्रभावशाली दृष्टिकोण है। यह इस बात पर मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है कि धर्म सामाजिक एकजुटता, नैतिक व्यवस्था और व्यक्तिगत अर्थ प्रदान करके समाज के स्थिरीकरण और कार्यप्रणाली में कैसे योगदान देता है। हालांकि, इसकी सीमाओं को स्वीकार करना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से धर्म के नकारात्मक पहलुओं और इसकी आंतरिक जटिलताओं को पूरी तरह से संबोधित करने में इसकी अक्षमता के संबंध में। इन सीमाओं के बावजूद, प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण धर्म और समाज के बीच जटिल संबंधों को समझने के लिए एक आवश्यक आधार प्रदान करता है।

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