कार्ल मार्क्स (1818-1883) के विचारों पर आधारित मार्क्सवादी उपागम, धर्म को सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं के एक उत्पाद और प्रतिबिंब के रूप में देखता है। मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के अनुसार, धर्म एक ऊपरी संरचनात्मक घटना है, जिसका अर्थ है कि यह समाज के आर्थिक आधार (उत्पादन के साधनों और उत्पादन संबंधों) से उत्पन्न होता है और उसे बनाए रखने में मदद करता है। यह उपागम धर्म को शक्तिशाली वर्गों द्वारा गरीबों को नियंत्रित करने और उन्हें सामाजिक असमानता की वास्तविकताओं से विचलित करने के एक उपकरण के रूप में देखता है।
धर्म: जनता की अफीम: मार्क्स का धर्म पर सबसे प्रसिद्ध कथन यह है कि यह "जनता की अफीम" है। इसका मतलब यह है कि धर्म एक मादक पदार्थ की तरह काम करता है जो लोगों को उनकी पीड़ा और शोषण की वास्तविकताओं से शांति या आराम प्रदान करता है। धर्म उन्हें इस जीवन में दुख को स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करता है, यह वादा करता है कि उन्हें अगले जीवन में पुरस्कृत किया जाएगा। यह विश्वास गरीबों को अपनी दमनकारी परिस्थितियों के खिलाफ विद्रोह करने से रोकता है, क्योंकि वे सोचते हैं कि उनके वर्तमान कष्टों का प्रतिफल भविष्य में मिलेगा। इस तरह, धर्म यथास्थिति को बनाए रखने में मदद करता है और पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संभावित क्रांति को रोकता है।
धर्म और सामाजिक नियंत्रण: मार्क्सवादी उपागम तर्क देता है कि धर्म एक सामाजिक नियंत्रण तंत्र के रूप में कार्य करता है। यह शासक वर्ग के हितों की सेवा करता है, मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को वैध बनाता है और असमानता को प्राकृतिक या ईश्वरीय रूप से अनिवार्य बताता है। उदाहरण के लिए, कई ऐतिहासिक समाजों में, राजाओं या शासकों के दैवीय अधिकार को धार्मिक सिद्धांतों द्वारा समर्थित किया गया था, जिससे उनकी शक्ति को चुनौती देना धार्मिक रूप से गलत माना जाता था। इसी तरह, जाति व्यवस्था या सामंती व्यवस्था में सामाजिक पदानुक्रम को अक्सर धार्मिक ग्रंथों या परंपराओं द्वारा उचित ठहराया जाता था, जिससे निम्न वर्गों के लिए अपनी स्थिति को चुनौती देना मुश्किल हो जाता था।
धर्म और अलगाव: मार्क्स ने अलगाव (alienation) की अवधारणा को भी धर्म से जोड़ा। पूंजीवादी समाजों में, श्रमिकों को उनके श्रम, उनके उत्पादों, एक-दूसरे और अपनी मानवीय क्षमता से अलग कर दिया जाता है। धर्म इस अलगाव का एक लक्षण है और एक प्रतिक्रिया भी। यह एक ऐसी दुनिया में अर्थ और उद्देश्य प्रदान करता है जहां श्रमिक खुद को शक्तिहीन और अपनी मेहनत से अलग महसूस करते हैं। अलगाव की भावना को कम करने के लिए धर्म एक काल्पनिक सांत्वना प्रदान करता है, लेकिन यह वास्तविक समस्या का समाधान नहीं करता है, बल्कि इसे और भी गहरा करता है। यह अलगाव को दूर करने के लिए आवश्यक वास्तविक सामाजिक परिवर्तन को रोकता है।
पूंजीवाद और धर्म: मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार, पूंजीवाद धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं को आकार देता है। पूंजीवादी समाज में, धर्म व्यक्तिगत नैतिक व्यवहार पर अधिक जोर दे सकता है, जैसे कड़ी मेहनत और संयम, जो पूंजीवादी उत्पादन के लिए फायदेमंद होते हैं। यह उन लोगों को भी नैतिक औचित्य प्रदान कर सकता है जिनके पास धन और शक्ति है, यह सुझाव देकर कि उनकी सफलता ईश्वर की कृपा का संकेत है। इस प्रकार, धर्म पूंजीवादी विचारधारा को सुदृढ़ करता है और शासक वर्ग के आर्थिक हितों की रक्षा करता है।
आलोचना और सीमाएँ: मार्क्सवादी उपागम की कई आलोचनाएँ की गई हैं:
- अत्यधिक आर्थिक निर्धारणवाद: आलोचकों का तर्क है कि यह उपागम धर्म को केवल आर्थिक कारकों का एक उत्पाद मानता है और इसकी स्वायत्तता और सामाजिक परिवर्तन को प्रेरित करने की क्षमता को अनदेखा करता है। धर्म अक्सर अपनी खुद की गतिशीलता रखता है और केवल आर्थिक हितों का एक प्रतिबिंब नहीं होता है।
- सामाजिक परिवर्तन में धर्म की भूमिका की उपेक्षा: मार्क्सवादी उपागम इस बात को स्वीकार करने में विफल रहता है कि धर्म सामाजिक आंदोलनों और परिवर्तन का एक शक्तिशाली स्रोत हो सकता है। उदाहरण के लिए, नागरिक अधिकार आंदोलन या मुक्ति धर्मशास्त्र (liberation theology) में धर्म ने उत्पीड़ितों को प्रेरित और एकजुट किया।
- व्यक्तिगत धार्मिक अनुभव की उपेक्षा: यह उपागम धर्म के व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक आयामों को कम आंकता है, जैसे कि अर्थ की खोज, आध्यात्मिक अनुभव और व्यक्तिगत आराम।
- केवल दमनकारी पहलू पर ध्यान: जबकि धर्म के दमनकारी पहलू मौजूद हैं, यह केवल उन्हीं पर ध्यान केंद्रित करता है और धर्म के सकारात्मक कार्यों, जैसे सामाजिक एकजुटता, सामुदायिक निर्माण और नैतिक मार्गदर्शन की उपेक्षा करता है।
निष्कर्ष: मार्क्सवादी उपागम धर्म को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है, खासकर जब यह धर्म और शक्ति, असमानता तथा आर्थिक संरचनाओं के बीच संबंधों का विश्लेषण करता है। यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि धर्म कैसे यथास्थिति को बनाए रखने में मदद कर सकता है और दमन के एक उपकरण के रूप में कार्य कर सकता है। हालांकि, यह उपागम धर्म की जटिलता के अन्य पहलुओं, जैसे कि इसकी स्वायत्तता, सामाजिक परिवर्तन की क्षमता और व्यक्तिगत अर्थ प्रदान करने की भूमिका को पूरी तरह से समझने में सीमित है। फिर भी, यह समाजशास्त्र में धर्म के अध्ययन के लिए एक मौलिक योगदान बना हुआ है।
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