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नगरीय समाजशास्त्र के प्रमुख सैद्धांतिक दृष्टिकोणों की विवेचना कीजिए।

नगरीय समाजशास्त्र नगरीय जीवन की जटिलताओं को समझने के लिए विभिन्न सैद्धांतिक दृष्टिकोणों का उपयोग करता है। ये दृष्टिकोण नगरीय घटनाओं, प्रक्रियाओं और संरचनाओं की व्याख्या करने के लिए अलग-अलग विश्लेषणात्मक लेंस प्रदान करते हैं। नगरीय समाजशास्त्र में सबसे प्रभावशाली दृष्टिकोणों में प्रकार्यवाद, संघर्ष सिद्धांत, प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद और मानव पारिस्थितिकी शामिल हैं।

1. मानव पारिस्थितिकी (Human Ecology): मानव पारिस्थितिकी नगरीय समाजशास्त्र में सबसे पुराने और सबसे प्रभावशाली दृष्टिकोणों में से एक है, जो शिकागो स्कूल के रॉबर्ट ई. पार्क और अर्नेस्ट बर्गेस के काम से जुड़ा है। यह दृष्टिकोण जीव विज्ञान से पारिस्थितिकी अवधारणाओं को उधार लेता है, शहरों को एक पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में देखता है जहां विभिन्न सामाजिक समूह संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और अपने "प्राकृतिक क्षेत्रों" में निवास करते हैं।

मुख्य अवधारणाएँ:

  • प्रतियोगिता (Competition): विभिन्न सामाजिक समूह (जातीय समूह, आर्थिक वर्ग, आदि) नगरीय स्थान और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  • आक्रमण, वर्चस्व और उत्तराधिकार (Invasion, Dominance, and Succession): ये अवधारणाएँ बताती हैं कि कैसे एक समूह एक क्षेत्र पर आक्रमण करता है, दूसरे पर हावी होता है, और अंततः उसकी जगह लेता है, जिससे नगरीय परिदृश्य और सामाजिक संरचनाएँ बदल जाती हैं।
  • प्राकृतिक क्षेत्र (Natural Areas): प्रतिस्पर्धा और चयन के परिणामस्वरूप, शहर विभिन्न "प्राकृतिक क्षेत्रों" में विभाजित हो जाते हैं, जैसे कि केंद्रीय व्यापार जिला, मजदूर वर्ग के आवासीय क्षेत्र, जातीय एन्क्लेव, आदि। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताएं होती हैं।
  • सामाजिक डार्विनवाद (Social Darwinism): इस दृष्टिकोण में अंतर्निहित यह विचार है कि सबसे अनुकूलनीय और कुशल समूह नगरीय वातावरण में जीवित रहते हैं और पनपते हैं।

आलोचना: मानव पारिस्थितिकी पर अत्यधिक नियतिवादी होने और आर्थिक तथा राजनीतिक शक्ति संबंधों की भूमिका की उपेक्षा करने का आरोप लगाया गया है। यह इस बात पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता कि कौन नगरीय विकास का निर्णय लेता है और किसका लाभ होता है। इसे नगरीय जीवन को अत्यधिक अवैयक्तिक और जैविक प्रक्रियाओं तक सीमित करने के लिए भी आलोचना की गई है।

2. प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण (Functionalist Perspective): प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण समाज को एक जटिल प्रणाली के रूप में देखता है जिसके विभिन्न हिस्से समाज की स्थिरता और एकजुटता में योगदान करते हैं। नगरीय समाजशास्त्र में, प्रकार्यवाद इस बात पर ध्यान केंद्रित करता है कि नगरीय संरचनाएं और प्रक्रियाएं समाज की समग्र कार्यप्रणाली में कैसे योगदान करती हैं।

मुख्य अवधारणाएँ:

  • सामाजिक व्यवस्था और स्थिरता (Social Order and Stability): नगरीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए विभिन्न नगरीय संस्थान (सरकार, पुलिस, शिक्षा, आदि) कैसे कार्य करते हैं।
  • श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण (Division of Labor and Specialization): दुर्खीम के काम पर आधारित, यह दृष्टिकोण बताता है कि कैसे नगरीय क्षेत्रों में श्रम विभाजन और व्यावसायिक विशिष्टीकरण सामाजिक एकीकरण के एक नए रूप (सावयवी एकजुटता) को जन्म देता है, जो पारंपरिक ग्रामीण समाजों में यांत्रिक एकजुटता से भिन्न होता है।
  • सामाजिक नियंत्रण (Social Control): औपचारिक और अनौपचारिक नियंत्रण तंत्र नगरीय वातावरण में सामाजिक मानदंडों को कैसे लागू करते हैं।
  • नगरीय विकास के लाभ (Benefits of Urban Growth): नगरीयकरण को आर्थिक विकास, नवाचार, सामाजिक गतिशीलता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के लिए देखा जाता है।

आलोचना: प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण पर यथास्थिति को वैध बनाने और नगरीय जीवन के नकारात्मक पहलुओं जैसे गरीबी, असमानता, अपराध और विघटन की उपेक्षा करने का आरोप लगाया गया है। यह सामाजिक परिवर्तन और संघर्ष की व्याख्या करने में भी कमजोर है।

3. संघर्ष सिद्धांत दृष्टिकोण (Conflict Theory Perspective): संघर्ष सिद्धांत समाज को समूहों के बीच शक्ति, संसाधनों और मूल्यों के लिए प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र के रूप में देखता है। नगरीय समाजशास्त्र में, यह दृष्टिकोण नगरीय विकास और नगरीय समस्याओं को शक्ति संबंधों, असमानता और वर्ग संघर्ष के परिणामों के रूप में व्याख्या करता है। यह कार्ल मार्क्स के विचारों से काफी प्रभावित है।

मुख्य अवधारणाएँ:

  • नगरीय पूंजीवाद (Urban Capitalism): शहर पूंजीवादी उत्पादन के तरीकों के केंद्र हैं, जहां पूंजीपति वर्ग लाभ और संचय के लिए नगरीय स्थान का शोषण करता है।
  • शक्ति और असमानता (Power and Inequality): नगरीय संरचनाएं और नीतियां हमेशा तटस्थ नहीं होतीं; वे शक्तिशाली समूहों (उदाहरण के लिए, भू-डेवलपर्स, पूंजीपति, राजनीतिक अभिजात वर्ग) के हितों को दर्शाती हैं, जो अक्सर वंचित समूहों की कीमत पर होता है।
  • नगरीय संघर्ष (Urban Conflict): वर्ग, जाति, लिंग या अन्य सामाजिक श्रेणियों के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष नगरीय जीवन का एक अंतर्निहित हिस्सा है (उदाहरण के लिए, जेंट्रिफिकेशन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन)।
  • स्थानिक असमानता (Spatial Inequality): असमानता केवल सामाजिक नहीं है, बल्कि स्थानिक भी है, जहां वंचित समूह अक्सर खराब गुणवत्ता वाले आवास और सेवाओं वाले क्षेत्रों में केंद्रित होते हैं।
  • न्यू अर्बन सोशियोलॉजी: मैनुअल कास्टेल्स और डेविड हार्वे जैसे विद्वानों ने इस दृष्टिकोण को विकसित किया, यह तर्क देते हुए कि नगरीय विकास राजनीतिक अर्थव्यवस्था और पूंजीवादी प्रक्रियाओं का परिणाम है।

आलोचना: संघर्ष सिद्धांत पर आर्थिक नियतिवादी होने और गैर-आर्थिक कारकों (जैसे संस्कृति या धर्म) की भूमिका की उपेक्षा करने का आरोप लगाया गया है। यह कभी-कभी सामाजिक सामंजस्य और सहयोग के अस्तित्व को समझाने में भी कमजोर होता है।

4. प्रतीकात्मक अंतःक्रियावादी दृष्टिकोण (Symbolic Interactionist Perspective): प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद सूक्ष्म स्तर पर सामाजिक अंतःक्रियाओं और साझा अर्थों पर ध्यान केंद्रित करता है। नगरीय समाजशास्त्र में, यह दृष्टिकोण इस बात पर प्रकाश डालता है कि व्यक्ति नगरीय वातावरण में कैसे अर्थ उत्पन्न करते हैं, अपनी पहचान कैसे बनाते हैं और एक-दूसरे के साथ कैसे बातचीत करते हैं। यह जॉर्ज सिमेल और शिकागो स्कूल के लुईस विर्थ के काम से काफी प्रभावित है।

मुख्य अवधारणाएँ:

  • नगरीय व्यक्ति की पहचान (Urban Identity): नगरीय जीवन की तीव्रता और गुमनामी व्यक्ति की पहचान और स्वयं की भावना को कैसे प्रभावित करती है।
  • सामाजिक दूरी और उदासीनता (Social Distance and Blasé Attitude): सिमेल के अनुसार, नगरीय वातावरण की भीड़भाड़ और उत्तेजनाओं की अधिकता व्यक्तियों को भावनात्मक रूप से खुद को दूर रखने और एक "उदासीन रवैया" विकसित करने के लिए प्रेरित करती है।
  • नगरीय उपसंस्कृतियाँ (Urban Subcultures): नगरीय स्थान विभिन्न जीवन शैली, मूल्यों और मानदंडों वाले विभिन्न उपसंस्कृतियों के विकास को कैसे बढ़ावा देते हैं।
  • स्थान की भावना (Sense of Place): व्यक्ति नगरीय स्थानों के साथ कैसे भावनात्मक संबंध बनाते हैं और इन स्थानों को क्या अर्थ देते हैं।
  • सूक्ष्म अंतःक्रियाएँ (Micro-interactions): नगरीय सेटिंग्स में रोजमर्रा की अंतःक्रियाएं (जैसे सार्वजनिक परिवहन में अजनबियों से बातचीत) सामाजिक व्यवस्था और व्यक्तिगत अनुभवों को कैसे आकार देती हैं।

आलोचना: प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद पर नगरीय जीवन के व्यापक संरचनात्मक कारकों (जैसे आर्थिक शक्ति या राजनीतिक नीतियां) की उपेक्षा करने का आरोप लगाया गया है। यह व्यापक नगरीय समस्याओं जैसे गरीबी या असमानता की व्याख्या करने में भी सीमित हो सकता है।

निष्कर्ष: नगरीय समाजशास्त्र के ये प्रमुख सैद्धांतिक दृष्टिकोण नगरीय जीवन की बहुआयामी प्रकृति को समझने के लिए पूरक अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। मानव पारिस्थितिकी नगरीय क्षेत्रों में स्थानिक संगठन और प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि प्रकार्यवाद नगरीय संस्थानों के स्थिर कार्यों पर जोर देता है। संघर्ष सिद्धांत शक्ति, असमानता और वर्ग संघर्ष के लेंस के माध्यम से नगरीय विकास का विश्लेषण करता है, और प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद व्यक्तिगत अनुभव, अर्थ-निर्माण और नगरीय जीवन में सूक्ष्म अंतःक्रियाओं पर प्रकाश डालता है। किसी एक दृष्टिकोण पर विशेष रूप से निर्भर रहने के बजाय, नगरीय समाजशास्त्रियों अक्सर इन विभिन्न सैद्धांतिक उपकरणों को जोड़कर नगरीय जटिलताओं की अधिक व्यापक और सूक्ष्म समझ प्राप्त करते हैं।

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