नगरीय समाजशास्त्र (Urban Sociology) समाजशास्त्र का एक विशिष्ट उप-अनुशासन है जो नगरीय जीवन, नगरीय संरचनाओं, सामाजिक संबंधों और नगरीय प्रक्रियाओं का व्यवस्थित अध्ययन करता है। इसकी उत्पत्ति और ऐतिहासिक विकास को औद्योगिक क्रांति, नगरीकरण की तीव्र गति और सामाजिक समस्याओं के प्रति अकादमिक प्रतिक्रिया के संदर्भ में समझा जा सकता है।
उत्पत्ति: औद्योगिक क्रांति और नगरीकरण का उदय: नगरीय समाजशास्त्र की जड़ें 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में हुई औद्योगिक क्रांति और उसके परिणामस्वरूप हुए तीव्र नगरीकरण में निहित हैं। औद्योगिक उत्पादन प्रणाली के आगमन ने ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बड़े पैमाने पर प्रवासन को जन्म दिया, जिससे शहरों की आबादी में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। ये तेजी से बढ़ते शहर न केवल आर्थिक अवसरों के केंद्र थे, बल्कि कई गंभीर सामाजिक समस्याओं के केंद्र भी बन गए, जिनमें अत्यधिक भीड़भाड़, गरीबी, बीमारी, अपराध, प्रदूषण और सामाजिक विघटन शामिल थे।
इस पृष्ठभूमि में, समाजशास्त्रीय विचारकों ने इन नई नगरीय वास्तविकताओं को समझने का प्रयास किया। क्लासिकल समाजशास्त्री जैसे एमिल दुर्खीम, फर्डिनेंड टोनिस (Ferdinand Tönnies), मैक्स वेबर और जॉर्ज सिमेल (Georg Simmel) ने नगरीय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया, यद्यपि उन्होंने एक पृथक "नगरीय समाजशास्त्र" की स्थापना नहीं की।
- फर्डिनेंड टोनिस: उन्होंने 'जेमिनशाफ्ट' (समुदाय) और 'गेसेलशाफ्ट' (समाज) की अवधारणाओं के माध्यम से ग्रामीण और नगरीय जीवन के बीच अंतर किया। गेसेलशाफ्ट (नगरीय जीवन) को व्यक्तिगतता, तर्कसंगतता और अप्रत्यक्ष संबंधों की विशेषता थी, जबकि जेमिनशाफ्ट (ग्रामीण जीवन) को घनिष्ठ संबंधों और साझा परंपराओं की विशेषता थी।
- एमिल दुर्खीम: उन्होंने 'यांत्रिक एकजुटता' (mechanical solidarity) से 'सावयवी एकजुटता' (organic solidarity) में संक्रमण का वर्णन किया, जो औद्योगिक समाजों में नगरीकरण के साथ आता है। सावयवी एकजुटता श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण पर आधारित थी, जो नगरीय क्षेत्रों में अधिक प्रचलित थी।
- मैक्स वेबर: उन्होंने नगरीय जीवन को एक विशिष्ट आर्थिक और राजनीतिक संगठन के रूप में देखा, जिसमें बाज़ार अर्थव्यवस्था और तर्कसंगत नौकरशाही प्रशासन का प्रभुत्व था।
- जॉर्ज सिमेल: उनके निबंध "द मेट्रोपोलिस एंड मेंटल लाइफ" (The Metropolis and Mental Life) ने नगरीय व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक अनुभवों पर ध्यान केंद्रित किया। सिमेल ने तर्क दिया कि नगरीय जीवन की तीव्रता, उत्तेजनाओं की अधिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग ने नगरीय व्यक्ति में एक विशिष्ट "ब्लैसे एटीट्यूड" (उदासीन रवैया) विकसित किया, जो भावनात्मक प्रतिक्रिया को कम करता है और व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है।
इन क्लासिकल विचारों ने नगरीय समाजशास्त्र के बाद के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान किया, नगरीय जीवन के विशिष्ट चरित्र और इसके सामाजिक प्रभावों पर ध्यान केंद्रित किया।
शिकागो स्कूल का उदय और सुदृढीकरण (20वीं सदी की शुरुआत): नगरीय समाजशास्त्र के एक विशिष्ट उप-अनुशासन के रूप में औपचारिक स्थापना का श्रेय शिकागो स्कूल (Chicago School) को जाता है, जो 20वीं सदी की शुरुआत में शिकागो विश्वविद्यालय में विकसित हुआ। रॉबर्ट ई. पार्क (Robert E. Park), अर्नेस्ट बर्गेस (Ernest Burgess) और लुईस विर्थ (Louis Wirth) जैसे विद्वानों ने नगरीय समाजशास्त्र को एक व्यवस्थित अध्ययन क्षेत्र के रूप में स्थापित किया।
- रॉबर्ट ई. पार्क: उन्होंने मानव पारिस्थितिकी (human ecology) की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें शहरों को एक पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में देखा गया, जहां विभिन्न समूह अस्तित्व के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और अपने "प्राकृतिक क्षेत्रों" में निवास करते हैं। पार्क ने शहरों में "नैतिकता के बिना व्यवस्था" (order without morality) पर जोर दिया, जहां सामाजिक नियंत्रण पारंपरिक ग्रामीण समुदायों की तुलना में कम प्रभावी था।
- अर्नेस्ट बर्गेस: उन्होंने "कंसेंट्रिक जोन मॉडल" (Concentric Zone Model) विकसित किया, जो यह बताता है कि शहर एक केंद्रीय व्यापार जिले के चारों ओर संकेंद्रित वृत्तों में बढ़ते हैं, प्रत्येक वृत्त की अपनी विशिष्ट सामाजिक और आर्थिक विशेषताएं होती हैं।
- लुईस विर्थ: उनके प्रभावशाली निबंध "अर्बनिज़्म एज़ अ वे ऑफ़ लाइफ" (Urbanism as a Way of Life) ने नगरीय जीवन को जनसंख्या के आकार, घनत्व और विषमता के संदर्भ में परिभाषित किया। विर्थ ने तर्क दिया कि ये कारक नगरीय व्यक्तियों के व्यवहार, व्यक्तित्व और सामाजिक संबंधों पर गहरा प्रभाव डालते हैं, जिससे सतही, क्षणिक और अवैयक्तिक संबंध उत्पन्न होते हैं।
शिकागो स्कूल ने प्रत्यक्ष अवलोकन, केस स्टडी, जीवन इतिहास और सामाजिक मानचित्रण जैसी गुणात्मक अनुसंधान विधियों पर जोर दिया, जिससे नगरीय जीवन की जटिलता को विस्तार से समझा जा सके।
विकास और समालोचना (मध्य-20वीं सदी से वर्तमान तक): शिकागो स्कूल के बाद, नगरीय समाजशास्त्र का विकास कई दिशाओं में हुआ:
- न्यू अर्बन सोशियोलॉजी (New Urban Sociology): 1960 और 70 के दशक में, मार्क्सवादी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर, "न्यू अर्बन सोशियोलॉजी" उभरा। मैनुअल कास्टेल्स (Manuel Castells), डेविड हार्वे (David Harvey) और हेनरी लेफेब्रे (Henri Lefebvre) जैसे विद्वानों ने तर्क दिया कि नगरीय विकास केवल पारिस्थितिक प्रक्रियाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि पूंजीवादी उत्पादन के तरीकों, शक्ति संबंधों और राजनीतिक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शहर केवल रहने की जगह नहीं हैं, बल्कि पूंजीवादी संचय और संघर्ष के क्षेत्र भी हैं। इस दृष्टिकोण ने यह भी आलोचना की कि शिकागो स्कूल ने शक्ति और असमानता की संरचनात्मक जड़ों की उपेक्षा की थी।
- विश्व नगरी और वैश्विक नगरीकरण: हाल के दशकों में, नगरीय समाजशास्त्र का ध्यान वैश्विक नगरीकरण, विश्व शहरों (global cities) और बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रभाव पर केंद्रित हो गया है। सास्किया सासेन (Saskia Sassen) जैसे विद्वानों ने यह दिखाया है कि कैसे कुछ बड़े शहर वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख नोड बन गए हैं, जिससे असमानता और सामाजिक स्तरीकरण की नई परतें बन रही हैं।
- नगरीय संस्कृति और पहचान: नगरीय समाजशास्त्री नगरीय उपसंस्कृतियों, पहचान निर्माण, स्थान की भावना (sense of place) और नगरीय क्षेत्रों में सामाजिक आंदोलनों का भी अध्ययन करते हैं।
- पर्यावरणीय नगरीय समाजशास्त्र: बढ़ते पर्यावरणीय मुद्दों के साथ, नगरीय समाजशास्त्र अब नगरीय पर्यावरण, स्थिरता और जलवायु परिवर्तन के साथ नगरीय जीवन के संबंधों की भी पड़ताल कर रहा है।
समालोचनात्मक मूल्यांकन: नगरीय समाजशास्त्र ने नगरीय जीवन की हमारी समझ में अमूल्य योगदान दिया है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएँ और आलोचनाएँ भी हैं:
- यूरोसेंट्रिक और अमेरिकी-केंद्रित पूर्वाग्रह: शुरुआती नगरीय समाजशास्त्र, विशेष रूप से शिकागो स्कूल, काफी हद तक पश्चिमी शहरों, विशेष रूप से शिकागो के अनुभव पर केंद्रित था। इससे विकासशील देशों या गैर-पश्चिमी संदर्भों में नगरीकरण की विभिन्न प्रक्रियाओं को समझने में चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं।
- परिभाषा की समस्या: "नगरीय" क्या है इसकी सटीक परिभाषा को लेकर हमेशा बहस रही है, जिससे तुलनात्मक अध्ययन मुश्किल हो जाते हैं।
- अति-सामान्यीकरण: कुछ सिद्धांतों को सभी प्रकार के शहरों पर लागू करने का प्रयास किया गया है, जबकि शहरों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संदर्भों में काफी भिन्नता होती है।
- शक्ति संबंधों की उपेक्षा (शिकागो स्कूल के लिए): न्यू अर्बन सोशियोलॉजी ने शिकागो स्कूल की इस आलोचना की कि उसने पूंजीवादी उत्पादन के तरीकों, वर्ग संघर्ष और शक्ति संबंधों की भूमिका को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया।
निष्कर्षतः, नगरीय समाजशास्त्र एक गतिशील और विकासशील उप-अनुशासन है जिसकी उत्पत्ति औद्योगिक क्रांति और नगरीकरण की सामाजिक समस्याओं के प्रति अकादमिक प्रतिक्रिया में हुई। क्लासिकल समाजशास्त्रियों द्वारा स्थापित वैचारिक नींव पर, शिकागो स्कूल ने इसे एक विशिष्ट अध्ययन क्षेत्र के रूप में आकार दिया। बाद में, मार्क्सवादी और वैश्विक दृष्टिकोणों ने इसकी समझ को और समृद्ध किया। इन आलोचनाओं के बावजूद, नगरीय समाजशास्त्र आज भी नगरीय जीवन की जटिलताओं को समझने और समकालीन नगरीय चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए एक अपरिहार्य उपकरण बना हुआ है।
Subscribe on YouTube - NotesWorld
For PDF copy of Solved Assignment
Any University Assignment Solution
