भारतीय आर्य भाषाएँ भारोपीय भाषा-परिवार की एक प्रमुख शाखा हैं। हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, राजस्थानी, उड़िया, असमिया, नेपाली आदि आधुनिक भारतीय भाषाएँ इसी शाखा से विकसित हुई हैं। इन भाषाओं का विकास किसी एक भाषा से सीधे नहीं हुआ, बल्कि लगभग तीन हजार वर्षों में विभिन्न भाषिक अवस्थाओं से गुजरते हुए हुआ है। भारतीय आर्य भाषाओं के विकास को सामान्यतः प्राचीन भारतीय आर्य, मध्य भारतीय आर्य और नवीन भारतीय आर्य—इन तीन प्रमुख कालों में बाँटा जाता है।
1. प्राचीन भारतीय आर्य भाषा
भारतीय आर्य भाषाओं के विकास का प्रारम्भिक चरण प्राचीन भारतीय आर्य भाषा का है। इसका प्रमुख रूप वैदिक संस्कृत तथा बाद में लौकिक संस्कृत के रूप में दिखाई देता है। वैदिक संस्कृत का सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण उदाहरण ऋग्वेद है। इसमें उस समय की भाषा का प्राचीन स्वरूप सुरक्षित है। वैदिक संस्कृत में ध्वनियों, शब्द-रूपों तथा क्रिया-रूपों की पर्याप्त विविधता दिखाई देती है।
कालांतर में संस्कृत अधिक व्यवस्थित और व्याकरणसम्मत रूप में विकसित हुई। पाणिनि ने अपने प्रसिद्ध व्याकरण-ग्रंथ अष्टाध्यायी में संस्कृत के स्वरूप को नियमबद्ध किया। इस व्यवस्थित भाषा को सामान्यतः लौकिक या शास्त्रीय संस्कृत कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, भवभूति आदि के ग्रंथ इसके विकसित स्वरूप के प्रमाण हैं।
संस्कृत का प्रयोग मुख्यतः विद्वानों, धार्मिक तथा साहित्यिक क्षेत्रों में अधिक रहा। जनसामान्य की बोलचाल की भाषा समय के साथ अलग-अलग रूप ग्रहण करती गई। इन्हीं लोकभाषिक रूपों से आगे चलकर प्राकृत भाषाओं का विकास हुआ।
2. मध्य भारतीय आर्य भाषा
लगभग 600 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी तक के भाषिक विकास को सामान्यतः मध्य भारतीय आर्य काल कहा जाता है। इस काल में संस्कृत के साथ-साथ अनेक लोकभाषिक रूप विकसित हुए, जिन्हें सामूहिक रूप से प्राकृत कहा गया। ‘प्राकृत’ का संबंध सामान्य जनता की स्वाभाविक अथवा लोक-प्रचलित भाषा से माना जाता है।
मध्य भारतीय आर्य अवस्था को तीन प्रमुख चरणों में देखा जाता है—प्राकृत, पालि और अपभ्रंश आदि। बौद्ध धर्म के ग्रंथों में पालि का महत्वपूर्ण स्थान है। जैन धर्म के साहित्य में अर्धमागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री आदि प्राकृतों का व्यापक प्रयोग हुआ। संस्कृत की अपेक्षा इन भाषाओं में व्याकरणिक जटिलता कम हुई और बोलचाल की प्रवृत्तियाँ अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगीं।
प्राकृतों के प्रमुख रूपों में महाराष्ट्री, शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी उल्लेखनीय हैं। इनका प्रयोग अलग-अलग क्षेत्रों और साहित्यिक परंपराओं में हुआ। उदाहरण के लिए महाराष्ट्री का प्रयोग मुख्यतः काव्य में, शौरसेनी का नाटकों तथा उत्तर-पश्चिमी-मध्य क्षेत्रों में और मागधी का पूर्वी भारत में प्रभाव रहा।
समय के साथ प्राकृतों में भी परिवर्तन हुआ और उनके बाद की अवस्थाओं को अपभ्रंश कहा गया। ‘अपभ्रंश’ शब्द का अर्थ है—पूर्ववर्ती रूप से परिवर्तित या विचलित रूप। किंतु भाषावैज्ञानिक दृष्टि से अपभ्रंश को किसी ‘भ्रष्ट’ भाषा के अर्थ में नहीं समझना चाहिए। यह भारतीय आर्य भाषाओं के स्वाभाविक विकास की एक महत्वपूर्ण अवस्था थी।
अपभ्रंश लगभग 6वीं से 10वीं-11वीं शताब्दी तक साहित्यिक और लोकभाषिक रूपों में विकसित हुआ। स्वयंभू, पुष्पदंत, धनपाल आदि रचनाकारों ने अपभ्रंश साहित्य को समृद्ध किया। हिन्दी के विकास में विशेष रूप से शौरसेनी अपभ्रंश की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है, जबकि अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं के विकास में अलग-अलग अपभ्रंश परंपराओं का योगदान रहा।
3. अवहट्ट : संक्रमण की अवस्था
अपभ्रंश के बाद भारतीय आर्य भाषाओं के इतिहास में अवहट्ट की अवस्था दिखाई देती है। इसे अपभ्रंश और नवीन भारतीय आर्य भाषाओं के बीच की संक्रमणकालीन कड़ी माना जाता है। अवहट्ट में अपभ्रंश के पुराने रूपों के साथ-साथ आधुनिक भाषाओं की नई प्रवृत्तियाँ भी दिखाई देती हैं।
इस अवस्था में संज्ञा और क्रिया के पुराने रूप सरल होने लगे तथा वाक्य-संरचना में आधुनिक भारतीय भाषाओं की विशेषताएँ उभरने लगीं। शब्दों के रूप अपेक्षाकृत सरल हुए और परसर्गों का प्रयोग बढ़ने लगा। इसी क्रम में विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के स्वतंत्र रूप विकसित होने की आधारभूमि तैयार हुई।
4. नवीन भारतीय आर्य भाषाएँ
लगभग 1000 ईस्वी के बाद भारतीय आर्य भाषाओं के विकास का नवीन चरण प्रारम्भ होता है। इस काल में क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का क्रमशः स्वतंत्र विकास हुआ। आधुनिक हिन्दी, बंगला, असमिया, उड़िया, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, कश्मीरी, नेपाली आदि इसी चरण की भाषाएँ हैं।
हिन्दी के विकास में शौरसेनी अपभ्रंश और अवहट्ट की विशेष भूमिका रही। आगे चलकर हिन्दी क्षेत्र में अनेक बोलियाँ विकसित हुईं, जैसे—ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, बघेली, हरियाणवी, राजस्थानी क्षेत्र की विभिन्न बोलियाँ आदि। मध्यकाल में ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक विकास अत्यंत समृद्ध हुआ। सूरदास की काव्य-परंपरा में ब्रजभाषा और तुलसीदास की रामचरितमानस में अवधी का महत्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक काल में खड़ी बोली के आधार पर मानक हिन्दी का विकास हुआ।
इसी प्रकार पूर्वी भारत में बंगला, असमिया और उड़िया, पश्चिमी भारत में मराठी और गुजराती, उत्तर-पश्चिम में पंजाबी और सिंधी आदि भाषाओं का स्वतंत्र विकास हुआ। इन भाषाओं में संस्कृत के साथ-साथ प्राकृत, अपभ्रंश और स्थानीय भाषाओं का भी योगदान रहा।
5. भारतीय आर्य भाषाओं के विकास की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
भारतीय आर्य भाषाओं के विकास में कुछ सामान्य प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं। संस्कृत की अपेक्षा प्राकृतों में ध्वनियों का सरलीकरण हुआ। संयुक्त व्यंजनों का टूटना, कठिन ध्वनियों का सरल होना और शब्द-रूपों का संक्षिप्त होना इसी प्रक्रिया का हिस्सा था। आगे चलकर अपभ्रंश और नवीन आर्य भाषाओं में विभक्ति-प्रणाली का ह्रास हुआ और उसके स्थान पर परसर्गों का प्रयोग बढ़ा।
इसी प्रकार संज्ञा और क्रिया के रूप सरल हुए तथा वाक्य-संरचना अधिक विश्लेषणात्मक होती गई। उदाहरण के लिए संस्कृत में संबंध आदि को व्यक्त करने के लिए अनेक विभक्ति-रूप थे, जबकि आधुनिक हिन्दी में ‘का, के, की’, ‘को’, ‘से’, ‘में’, ‘पर’ जैसे परसर्गों का प्रयोग होता है। शब्दावली में संस्कृत के अतिरिक्त प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, तुर्की, पुर्तगाली और अंग्रेज़ी आदि भाषाओं से भी शब्द आए।
निष्कर्ष
इस प्रकार भारतीय आर्य भाषाओं का विकास एक निरंतर और क्रमिक भाषिक परिवर्तन की प्रक्रिया है। इसका सामान्य विकास-क्रम वैदिक संस्कृत → लौकिक संस्कृत → प्राकृत/पालि → अपभ्रंश → अवहट्ट → आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ माना जा सकता है। हालांकि सभी भाषाओं का विकास बिल्कुल एक समान मार्ग से नहीं हुआ, फिर भी इस क्रम से भारतीय आर्य भाषाओं की ऐतिहासिक परंपरा को समझने में सहायता मिलती है। संस्कृत ने आधार प्रदान किया, प्राकृतों ने लोकभाषिक स्वरूप को विकसित किया, अपभ्रंश ने आधुनिक भाषाओं की दिशा तैयार की और अवहट्ट ने संक्रमण की भूमिका निभाई। अंततः क्षेत्रीय परिस्थितियों, सामाजिक संपर्क और साहित्यिक परंपराओं के प्रभाव से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का स्वतंत्र एवं समृद्ध स्वरूप सामने आया।
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