हिन्दी कहानी आधुनिक हिन्दी गद्य की अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली विधा है। अपने आरंभिक विकास में हिन्दी कहानी पर लोककथा, आख्यायिका, उपदेशात्मक साहित्य और विदेशी कहानी-साहित्य का प्रभाव रहा, किंतु धीरे-धीरे उसने स्वतंत्र साहित्यिक पहचान बनाई। विशेष रूप से स्वतंत्रता के बाद हिन्दी कहानी में अनेक आंदोलन और प्रवृत्तियाँ सामने आईं। इन आंदोलनों ने कहानी के विषय, शिल्प, भाषा, पात्र और जीवन-दृष्टि में व्यापक परिवर्तन किए। प्रमुख कहानी आंदोलनों में नई कहानी, सचेतन कहानी, अकहानी, सहज कहानी, समानांतर कहानी और सक्रिय कहानी उल्लेखनीय हैं।
1. नई कहानी आंदोलन
नई कहानी आंदोलन का विकास मुख्यतः 1950 और 1960 के दशक में हुआ। स्वतंत्रता के बाद सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से परिवर्तन आया। नई कहानीकारों ने आदर्शवादी दृष्टि के स्थान पर व्यक्ति के वास्तविक जीवन, उसकी समस्याओं और मानसिक तनावों को केंद्र में रखा। मोहन राकेश, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर इस आंदोलन के प्रमुख कहानीकार माने जाते हैं। इनके साथ निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा आदि ने भी कहानी को नई दिशा दी।
नई कहानी में मध्यवर्गीय जीवन, पति-पत्नी के संबंध, अकेलापन, अस्तित्वगत संकट, मूल्य-संघर्ष और बदलते सामाजिक संबंध प्रमुख विषय बने। इसका सबसे बड़ा योगदान यह था कि कहानी में सामान्य मनुष्य के निजी जीवन और मनोवैज्ञानिक अनुभवों को गंभीर साहित्यिक विषय बनाया गया।
2. सचेतन कहानी आंदोलन
नई कहानी के बाद कहानी में जीवन के प्रति सक्रिय और जागरूक दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से ‘सचेतन कहानी’ की प्रवृत्ति सामने आई। महीप सिंह इसके प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं। इस आंदोलन ने जीवन की विसंगतियों से पलायन करने के बजाय उनका सजगता से सामना करने पर बल दिया।
सचेतन कहानी में व्यक्ति को सामाजिक परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया। इसमें संघर्षशीलता, सामाजिक उत्तरदायित्व और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पर बल दिया गया। इसका योगदान यह रहा कि कहानी को केवल मानसिक कुंठाओं और निजी तनावों तक सीमित न रखकर सामाजिक जीवन की सक्रिय चेतना से जोड़ा गया।
3. अकहानी आंदोलन
1960 के दशक में ‘अकहानी’ की प्रवृत्ति सामने आई। इसके पीछे पारंपरिक कहानी के कथानक, घटना-क्रम और कहानीपन के प्रति असंतोष था। अकहानीकारों ने जीवन के ऐसे अनुभवों को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया जिन्हें परंपरागत कथानक में बाँधना कठिन था।
इस प्रवृत्ति में कथानक की अपेक्षा अनुभूति, वातावरण, मानसिक स्थिति और क्षण विशेष को अधिक महत्त्व मिला। अस्तित्वगत संकट, अकेलापन, असंबद्धता और आधुनिक मनुष्य की विडंबनाएँ इसके प्रमुख विषय बने। यद्यपि अकहानी का प्रभाव व्यापक और स्थायी आंदोलन के रूप में बहुत अधिक नहीं रहा, फिर भी इसने कहानी के शिल्प और संरचना को प्रयोगशील बनाने में योगदान दिया।
4. सहज कहानी आंदोलन
सहज कहानी की प्रवृत्ति ने कहानी को कृत्रिमता और अत्यधिक बौद्धिक जटिलता से मुक्त करने पर बल दिया। अमृतराय को इस प्रवृत्ति से प्रमुख रूप से जोड़ा जाता है। सहज कहानी का उद्देश्य जीवन के अनुभवों को स्वाभाविक, सरल और संप्रेषणीय रूप में प्रस्तुत करना था।
इसका योगदान यह रहा कि कहानीकारों का ध्यान सामान्य जीवन, सहज मानवीय संबंधों और स्वाभाविक कथा-प्रवाह की ओर गया। इसने कहानी में कथ्य और शिल्प के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश की।
5. समानांतर कहानी आंदोलन
1970 के दशक में ‘समानांतर कहानी’ आंदोलन का विकास हुआ। कमलेश्वर इसके प्रमुख प्रवर्तकों में माने जाते हैं। इस आंदोलन ने समाज के उन वर्गों और जीवन-संदर्भों को कहानी के केंद्र में लाने का प्रयास किया जो मुख्यधारा के साहित्य में अपेक्षाकृत कम दिखाई देते थे।
समानांतर कहानी में मजदूर, निम्नवर्ग, आम आदमी, शोषित वर्ग तथा सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से संघर्ष करते लोगों को महत्त्व मिला। इस आंदोलन का प्रमुख योगदान कहानी को व्यापक सामाजिक यथार्थ से जोड़ना और आम आदमी की समस्याओं को साहित्य का केंद्रीय विषय बनाना था।
6. सक्रिय कहानी आंदोलन
सक्रिय कहानी की प्रवृत्ति ने कहानी को सामाजिक परिवर्तन और संघर्ष की चेतना से जोड़ने का प्रयास किया। राकेश वत्स को इसके प्रमुख प्रवर्तकों में माना जाता है। इस आंदोलन में निष्क्रियता, निराशा और पलायन के स्थान पर संघर्ष, प्रतिरोध और परिवर्तन की भावना पर बल दिया गया।
सक्रिय कहानी ने साहित्यकार के सामाजिक दायित्व को महत्त्व दिया और शोषण तथा अन्याय के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया। इसने कहानी को सामाजिक सरोकारों से अधिक निकटता से जोड़ा।
कहानी आंदोलनों का समग्र योगदान
हिन्दी के कहानी आंदोलनों ने कहानी को निरंतर बदलते समाज के अनुरूप विकसित किया। नई कहानी ने व्यक्ति और उसके मनोविज्ञान को केंद्र में रखा, सचेतन कहानी ने सामाजिक सक्रियता को महत्त्व दिया, अकहानी ने शिल्पगत रूढ़ियों को चुनौती दी, सहज कहानी ने स्वाभाविकता और संप्रेषणीयता पर बल दिया, समानांतर कहानी ने आम आदमी और वंचित वर्गों को स्वर दिया तथा सक्रिय कहानी ने संघर्ष और परिवर्तन की चेतना को प्रमुखता दी।
इन आंदोलनों का सबसे बड़ा योगदान यह है कि हिन्दी कहानी एक निश्चित शैली या विचारधारा तक सीमित नहीं रही। उसने बदलते समय के साथ अपने कथ्य, भाषा, शिल्प और दृष्टिकोण में परिवर्तन किया। बाद में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श और अन्य अस्मितामूलक लेखन ने कहानी को और अधिक व्यापक बनाया। इस प्रकार कहानी आंदोलनों ने हिन्दी कहानी को आधुनिक, बहुआयामी, प्रयोगशील और सामाजिक रूप से अधिक प्रासंगिक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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