शिक्षा पर गांधी और टैगोर के विचारों की तुलना और अंतर
महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर, भारत के दो महान विचारक और दूरदर्शी, बीसवीं सदी की शुरुआत में भारतीय शिक्षा के महत्वपूर्ण आलोचक और सुधारक थे। दोनों ही पारंपरिक पश्चिमी शिक्षा प्रणाली से असंतुष्ट थे और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत करते थे जो भारत की अपनी आत्मा, संस्कृति और आवश्यकताओं के अनुरूप हो। हालांकि उनके लक्ष्य समान थे - मानव का सर्वांगीण विकास और एक बेहतर समाज का निर्माण - उनके शैक्षिक दर्शन में कुछ महत्वपूर्ण समानताएं और विशिष्ट अंतर भी थे।
समानताएँ (Similarities):
1. सर्वांगीण विकास (Holistic Development):
- दोनों का मानना था कि शिक्षा केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक पहलुओं का भी विकास शामिल होना चाहिए।
- गांधी ने "शरीर, मन और आत्मा में सर्वश्रेष्ठ का सर्वांगीण विकास" की बात की, जबकि टैगोर ने "मानव व्यक्तित्व की सभी संकायों की सद्भावपूर्ण वृद्धि" पर जोर दिया।
2. व्यावहारिक और अनुभवात्मक शिक्षा (Practical and Experiential Learning):
- दोनों सैद्धांतिक ज्ञान के बजाय अनुभवजन्य और व्यावहारिक सीखने को महत्व देते थे।
- गांधी की 'नई तालीम' या 'बुनियादी शिक्षा' हस्तकला (craft-centered) पर आधारित थी, जिसमें बच्चे किसी शिल्प के माध्यम से सीखते थे, जिससे उनका बौद्धिक विकास भी होता था और वे आत्मनिर्भर भी बनते थे।
- टैगोर ने शांतिनिकेतन में प्रकृति के साथ सीधे संपर्क और रचनात्मक गतिविधियों, जैसे कला, संगीत और नाटक के माध्यम से सीखने पर जोर दिया।
3. स्वतंत्रता और रचनात्मकता (Freedom and Creativity):
- दोनों शिक्षा में बच्चे की स्वतंत्रता और रचनात्मकता को सर्वोच्च मानते थे। वे कठोर अनुशासन, रटने की शिक्षा और परीक्षा-उन्मुख प्रणाली के विरोधी थे।
- गांधी ने बच्चों को अपनी गति से सीखने और रचनात्मक रूप से संलग्न होने की वकालत की।
- टैगोर ने शांतिनिकेतन में एक ऐसा वातावरण बनाया जहाँ बच्चे प्रकृति में स्वतंत्र रूप से घूम सकें और अपनी रचनात्मक प्रतिभा का पोषण कर सकें।
4. भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर जोर (Emphasis on Indian Culture and Values):
- दोनों पश्चिमी शिक्षा के अंधानुकरण के खिलाफ थे और एक ऐसी शिक्षा प्रणाली चाहते थे जो भारतीय सांस्कृतिक विरासत, मूल्यों और परंपराओं में निहित हो।
- गांधी ने भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा और ग्रामीण जीवन के साथ जुड़ाव पर जोर दिया।
- टैगोर ने भारतीय कला, संगीत, साहित्य और दर्शन के अध्ययन को बढ़ावा दिया, और पश्चिमी विचारों का रचनात्मक संश्लेषण चाहते थे।
5. आत्मनिर्भरता और सामाजिक उत्तरदायित्व (Self-reliance and Social Responsibility):
- शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने में मदद करना था।
- गांधी की बुनियादी शिक्षा का लक्ष्य छात्रों को आत्मनिर्भर नागरिक बनाना था जो अपने श्रम से अपना जीवन यापन कर सकें और ग्रामीण समुदायों की सेवा कर सकें।
- टैगोर ने भी सामुदायिक जीवन और सामाजिक सेवा के महत्व पर जोर दिया, जहाँ छात्र अपने आसपास के समाज से जुड़ते और योगदान करते थे।
6. प्रकृति से जुड़ाव (Connection with Nature):
- दोनों का मानना था कि सीखना प्रकृति के साथ सद्भाव में होना चाहिए।
- गांधी ने बच्चों को प्रकृति के करीब रहने और प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य को समझने की वकालत की।
- टैगोर का शांतिनिकेतन प्रकृति की गोद में स्थित था, जहाँ कक्षाएँ अक्सर खुले आसमान के नीचे लगती थीं, और उनका मानना था कि प्रकृति बच्चे के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षिका है।
अंतर (Differences):
1. दृष्टिकोण का केंद्र बिंदु (Central Focus of Approach):
- गांधी: उनके शैक्षिक विचार मुख्य रूप से ग्रामीण भारत और बड़े पैमाने पर जनता के लिए शिक्षा पर केंद्रित थे। उनका जोर बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति, आत्मनिर्भरता और सामाजिक न्याय पर था। उनकी शिक्षा गरीब से गरीब व्यक्ति तक पहुँचने और उसे सशक्त बनाने पर केंद्रित थी।
- टैगोर: उनका दृष्टिकोण अधिक सौंदर्यवादी और सांस्कृतिक था। वे व्यक्तित्व के कलात्मक और बौद्धिक विकास, रचनात्मक अभिव्यक्ति और वैश्विक चेतना पर अधिक जोर देते थे। उनका लक्ष्य एक ऐसे व्यक्ति का निर्माण करना था जो अपनी संस्कृति में निहित हो लेकिन वैश्विक विचारों के लिए भी खुला हो।
2. शिक्षा का माध्यम और पाठ्यक्रम (Medium of Instruction and Curriculum):
- गांधी: उन्होंने 'मातृभाषा' को शिक्षा का माध्यम बनाने पर अत्यधिक जोर दिया। उनका पाठ्यक्रम हस्तकला-केंद्रित था, जैसे कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी, ताकि बच्चे काम करके सीखें और आत्मनिर्भर बनें। अंग्रेजी को द्वितीयक स्थान दिया गया था।
- टैगोर: उन्होंने भी मातृभाषा को महत्व दिया, लेकिन उनकी शिक्षा में कला, संगीत, नृत्य और साहित्य को केंद्रीय स्थान प्राप्त था। उन्होंने पश्चिमी ज्ञान और विज्ञान को भी एकीकृत करने का प्रयास किया और विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। शांतिनिकेतन में अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं का भी अध्ययन किया जाता था।
3. वैश्विक बनाम स्थानीय (Global vs. Local/National):
- गांधी: उनका दृष्टिकोण अधिक 'राष्ट्रीय' और 'स्वदेशी' था। वे भारतीय गांवों की आत्मनिर्भरता और भारत की अपनी पहचान को मजबूत करने पर केंद्रित थे।
- टैगोर: उनका दृष्टिकोण अधिक 'वैश्विक' और 'अंतर्राष्ट्रीय' था। वे विभिन्न संस्कृतियों के मिलन और विश्व-नागरिकता की अवधारणा में विश्वास करते थे। शांतिनिकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय इसी वैश्विक भावना का प्रतीक थे।
4. आध्यात्मिकता का स्वरूप (Nature of Spirituality):
- गांधी: उनकी शिक्षा में आध्यात्मिकता का अर्थ नैतिक मूल्यों, सत्य, अहिंसा और सेवा से था। यह कर्मठ और सामाजिक रूप से संलग्न आध्यात्मिकता थी।
- टैगोर: उनकी आध्यात्मिकता अधिक रहस्यमय, सौंदर्यवादी और प्रकृति-उन्मुख थी। यह ब्रह्मांड के साथ व्यक्तिगत संबंध और आंतरिक शांति और सौंदर्य की खोज से संबंधित थी।
5. शिक्षक की भूमिका (Role of Teacher):
- गांधी: शिक्षक एक मार्गदर्शक और एक उदाहरण था जो छात्रों को शिल्प के माध्यम से सीखने और नैतिक जीवन जीने में मदद करता था।
- टैगोर: शिक्षक एक "गुरु" था जो छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत था, जो उन्हें सोचने, महसूस करने और अपने तरीके से बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता था, अक्सर प्रकृति और कला के माध्यम से।
निष्कर्ष:
गांधी और टैगोर दोनों ने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की कल्पना की जो व्यक्ति को समग्र रूप से विकसित करे, उसे अपनी संस्कृति से जोड़े और उसे समाज का एक जिम्मेदार सदस्य बनाए। गांधी का दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक, आत्मनिर्भरता-उन्मुख और ग्रामीण भारत की आवश्यकताओं पर केंद्रित था, जबकि टैगोर का दृष्टिकोण अधिक सौंदर्यवादी, रचनात्मक और वैश्विक समझ पर केंद्रित था। दोनों के विचार भारतीय शिक्षा के लिए मार्गदर्शक प्रकाश बने हुए हैं, जो हमें एक ऐसी शिक्षा प्रणाली बनाने के लिए प्रेरित करते हैं जो न केवल ज्ञान प्रदान करती है, बल्कि चरित्र का निर्माण करती है, रचनात्मकता को पोषित करती है और व्यक्तियों को एक सार्थक जीवन जीने के लिए सशक्त बनाती है।
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