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साठोत्तरी हिन्दी काव्यधारा की प्रमुख दिशाओं तथा उनके वैशिष्ट्य को रेखांकित कीजिए।

हिन्दी कविता के विकासक्रम में साठोत्तरी कविता का विशेष महत्त्व है। ‘साठोत्तरी’ से आशय सामान्यतः सन् 1960 के बाद विकसित उस काव्यधारा से है, जिसने नई कविता की उपलब्धियों को आगे बढ़ाते हुए बदलते हुए सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ को अधिक तीखे ढंग से अभिव्यक्त किया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय समाज में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति मोहभंग, आर्थिक विषमता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अवसरवाद, युद्ध, सामाजिक तनाव और मध्यवर्गीय जीवन की जटिलताओं ने नई संवेदनाओं को जन्म दिया। साठोत्तरी कविता इन्हीं परिस्थितियों की उपज है।

नई कविता में जहाँ व्यक्ति की अस्तित्वगत पीड़ा, अकेलापन और आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ प्रमुख थीं, वहीं साठोत्तरी कविता में व्यक्ति और समाज के संबंध, राजनीतिक व्यवस्था, जनजीवन और प्रतिरोध की चेतना अधिक मुखर होकर सामने आती है। धूमिल, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह, श्रीकांत वर्मा, राजकमल चौधरी आदि कवियों ने इस धारा को समृद्ध किया।

1. राजनीतिक चेतना और व्यवस्था-विरोध

साठोत्तरी कविता की सबसे प्रमुख दिशा राजनीतिक चेतना है। स्वतंत्रता के बाद जनता ने जिस सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की अपेक्षा की थी, उसकी जगह भ्रष्टाचार, सत्ता-संघर्ष, राजनीतिक स्वार्थ और अवसरवाद दिखाई देने लगा। इस स्थिति से कवियों में मोहभंग उत्पन्न हुआ।

धूमिल की कविता में व्यवस्था के प्रति तीखा आक्रोश दिखाई देता है। रघुवीर सहाय ने लोकतंत्र में नागरिक की स्थिति, सत्ता के चरित्र और राजनीतिक पाखंड को उजागर किया। इस कविता में राजनीति कोई अलग विषय नहीं है; वह आम आदमी के दैनिक जीवन को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में उपस्थित होती है।

2. आम आदमी और जनजीवन की प्रतिष्ठा

साठोत्तरी कविता का एक महत्त्वपूर्ण वैशिष्ट्य सामान्य मनुष्य के जीवन की ओर गहरा झुकाव है। किसान, मजदूर, निम्न-मध्यवर्गीय व्यक्ति, बेरोजगार युवक और शहरी संघर्षशील मनुष्य इसके केंद्र में आते हैं।

इस दौर का कवि जीवन के हाशिए पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा और संघर्ष को केवल सहानुभूति से नहीं देखता, बल्कि उसके सामाजिक कारणों को पहचानने का प्रयास करता है। इसीलिए साठोत्तरी कविता में जनपक्षधरता और सामाजिक सरोकार प्रमुख हो जाते हैं।

3. मोहभंग और आक्रोश

साठोत्तरी कविता के मूल में मोहभंग की अनुभूति है। स्वतंत्रता के बाद जिस आदर्श समाज का सपना देखा गया था, वह वास्तविकता में भ्रष्ट और असमान व्यवस्था में बदलता हुआ दिखाई दिया। परिणामस्वरूप कवि की भाषा में निराशा, असंतोष और आक्रोश पैदा हुआ।

यह मोहभंग निष्क्रिय निराशा नहीं है। कवि व्यवस्था से प्रश्न करता है और उसके विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना विकसित करता है। धूमिल की कविता इसका सशक्त उदाहरण है, जहाँ भाषा सत्ता और सामाजिक विसंगतियों से सीधे टकराती है।

4. व्यंग्य, विडम्बना और विद्रूप

साठोत्तरी कविता में व्यंग्य और विडम्बना को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। कवियों ने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की विसंगतियों को सीधे उपदेश देने के बजाय व्यंग्यात्मक स्थितियों और तीखे कथनों के माध्यम से व्यक्त किया।

रघुवीर सहाय के यहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडम्बनाएँ, सर्वेश्वर के यहाँ राजनीतिक और सामाजिक विसंगतियाँ तथा धूमिल के यहाँ सत्ता और भाषा का संबंध व्यंग्यात्मक रूप में सामने आता है। व्यंग्य इस कविता में केवल हास्य का माध्यम नहीं, बल्कि यथार्थ को बेनकाब करने का हथियार है।

5. यथार्थवाद और जीवन से सीधा संबंध

साठोत्तरी कविता ने कल्पना और आदर्शीकरण की अपेक्षा जीवन के ठोस यथार्थ को अधिक महत्त्व दिया। शहर, सड़क, बाजार, कार्यालय, राजनीति, गरीबी, हिंसा, बेरोजगारी और पारिवारिक तनाव जैसी स्थितियाँ कविता में प्रवेश करती हैं।

कवि सामान्य जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में भी बड़े सामाजिक अर्थ खोजता है। इस प्रकार कविता का संसार अधिक वास्तविक और अनुभवपरक बनता है। इसमें ‘महान’ विषयों के साथ साधारण जीवन की छोटी घटनाएँ भी महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।

6. भाषा और शिल्प में परिवर्तन

साठोत्तरी कविता की भाषा में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। कवियों ने बोलचाल की भाषा, लोकप्रचलित शब्दों, मुहावरों और रोजमर्रा के जीवन की अभिव्यक्तियों को अपनाया। कविता की भाषा अधिक सहज, तीखी और संवादधर्मी हुई।

विशेष रूप से धूमिल ने भाषा को सत्ता और सामाजिक यथार्थ से टकराने का माध्यम बनाया। साठोत्तरी कवियों ने यह सिद्ध किया कि कविता के लिए केवल अलंकारिक या अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ भाषा आवश्यक नहीं है। साधारण भाषा भी गहरी सामाजिक और काव्यात्मक शक्ति रखती है।

7. अस्तित्व-बोध और अकेलापन

यद्यपि साठोत्तरी कविता सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की ओर अधिक उन्मुख है, फिर भी व्यक्ति का अस्तित्वगत संकट समाप्त नहीं होता। आधुनिक शहरी जीवन में व्यक्ति का अकेलापन, असुरक्षा, भय, तनाव और संबंधों का विघटन इस कविता में दिखाई देता है।

लेकिन नई कविता की तुलना में साठोत्तरी कवि इस व्यक्तिगत संकट को व्यापक सामाजिक परिस्थितियों से जोड़ता है। व्यक्ति की पीड़ा अब केवल निजी समस्या नहीं रह जाती; उसके पीछे मौजूद सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था भी प्रश्नांकित होती है।

8. मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बना

साठोत्तरी कविता में मध्यवर्ग का जीवन विशेष रूप से उभरता है। यह वर्ग आदर्शों और वास्तविकताओं के बीच फँसा हुआ है। वह व्यवस्था से असंतुष्ट भी है और अनेक बार उसी व्यवस्था का हिस्सा भी है। उसकी आर्थिक कठिनाइयाँ, समझौते, भय, महत्वाकांक्षाएँ और नैतिक द्वंद्व कविता में अभिव्यक्त होते हैं।

इस प्रकार साठोत्तरी कविता मध्यवर्गीय चेतना के अंतर्विरोधों को अत्यंत ईमानदारी से सामने लाती है।

9. स्त्री और हाशिए के जीवन की ओर बढ़ती दृष्टि

साठोत्तरी दौर में सामाजिक चेतना के विस्तार के साथ स्त्री, दलित, श्रमिक और अन्य वंचित वर्गों के जीवन की ओर भी ध्यान बढ़ा। यद्यपि दलित और स्त्री-विमर्श अपने स्वतंत्र सशक्त रूप में बाद के दशकों में अधिक विकसित हुए, फिर भी साठोत्तरी कविता ने उनके लिए वैचारिक जमीन तैयार की। मनुष्य की समानता और सामाजिक न्याय का प्रश्न इसकी व्यापक जनवादी चेतना का हिस्सा बना।

10. नई कविता से संबंध और उससे आगे जाने की प्रवृत्ति

साठोत्तरी कविता नई कविता का पूर्ण निषेध नहीं करती, बल्कि उसकी उपलब्धियों को ग्रहण करके उनसे आगे बढ़ती है। नई कविता के आधुनिकताबोध, अस्तित्व-बोध, बिंब-विधान और व्यक्ति-केंद्रित संवेदना को साठोत्तरी कविता ने सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों से जोड़ा। परिणामतः कविता अधिक प्रत्यक्ष, आक्रामक और जनोन्मुख हुई।

निष्कर्ष

साठोत्तरी हिन्दी कविता वस्तुतः स्वतंत्रता-उत्तर भारतीय समाज के मोहभंग, संघर्ष, विसंगति और प्रतिरोध की कविता है। इसकी प्रमुख दिशाओं में राजनीतिक चेतना, जनपक्षधरता, व्यवस्था-विरोध, सामाजिक यथार्थ, व्यंग्य-विडम्बना, मध्यवर्गीय जीवन की जटिलता, अस्तित्व-बोध तथा भाषा-शिल्प में नवीनता प्रमुख हैं। इस कविता ने साहित्य को जीवन की वास्तविक समस्याओं के अधिक निकट पहुँचाया।

साठोत्तरी कवियों ने कविता को केवल सौन्दर्य या निजी अनुभूति की अभिव्यक्ति न मानकर सामाजिक विवेक और प्रतिरोध की सक्रिय शक्ति बनाया। इसीलिए साठोत्तरी काव्यधारा आधुनिक हिन्दी कविता के विकास में एक निर्णायक मोड़ मानी जाती है।

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