भाषा मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संप्रेषण माध्यम है। मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं, अनुभवों तथा ज्ञान को व्यक्त करने के लिए भाषा का उपयोग करता है। भाषा मुख्यतः दो रूपों में प्रयुक्त होती है— उच्चारित भाषा और लिखित भाषा। उच्चारित भाषा वह है जिसे हम बोलते और सुनते हैं, जबकि लिखित भाषा वह है जिसे हम लिखते और पढ़ते हैं। दोनों भाषाओं का उद्देश्य संप्रेषण करना है, परंतु उनकी प्रकृति, शैली, संरचना तथा उपयोग में अनेक भिन्नताएँ पाई जाती हैं। दोनों के अपने-अपने गुण और विशेषताएँ हैं।
1. उच्चारित भाषा की विशेषताएँ
उच्चारित भाषा को मौखिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा ध्वनि के माध्यम से व्यक्त की जाती है। मनुष्य सबसे पहले बोलना सीखता है, इसलिए उच्चारित भाषा भाषा का प्रारंभिक रूप मानी जाती है।
(i) ध्वनि पर आधारित भाषा
उच्चारित भाषा का आधार ध्वनि है। इसमें शब्दों का उच्चारण करके विचार व्यक्त किए जाते हैं। श्रोता ध्वनियों को सुनकर अर्थ ग्रहण करता है। उदाहरण के लिए, जब शिक्षक कक्षा में पढ़ाते हैं, तो विद्यार्थी सुनकर ज्ञान प्राप्त करते हैं।
(ii) स्वाभाविक और सहज
उच्चारित भाषा स्वाभाविक होती है। मनुष्य बचपन से ही परिवार और समाज के संपर्क में आकर बोलना सीख जाता है। इसे सीखने के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। दैनिक जीवन में लोग सहज रूप से बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं।
(iii) तात्कालिकता
मौखिक भाषा में संप्रेषण तुरंत होता है। वक्ता जो बोलता है, श्रोता उसी समय सुन लेता है और प्रतिक्रिया भी तुरंत दे सकता है। इसलिए इसमें संवाद की गति तेज होती है। उदाहरण के रूप में बातचीत, भाषण और चर्चा को लिया जा सकता है।
(iv) हाव-भाव और संकेतों का सहयोग
उच्चारित भाषा में केवल शब्द ही नहीं, बल्कि चेहरे के भाव, हाथों के संकेत, आवाज़ का उतार-चढ़ाव आदि भी अर्थ स्पष्ट करने में सहायता करते हैं। इससे संप्रेषण अधिक प्रभावशाली बन जाता है।
(v) अस्थायी स्वरूप
मौखिक भाषा स्थायी नहीं होती। जो बात एक बार बोल दी जाती है, वह समाप्त हो जाती है। यदि उसे रिकॉर्ड न किया जाए, तो उसे सुरक्षित रखना कठिन होता है। इसलिए मौखिक भाषा का प्रभाव तात्कालिक होता है।
(vi) सरल और लचीली
उच्चारित भाषा में व्याकरण के नियमों का कठोर पालन आवश्यक नहीं होता। लोग परिस्थिति के अनुसार शब्दों और वाक्यों को बदलते रहते हैं। इसमें स्थानीय बोलियों और सरल शब्दों का अधिक प्रयोग होता है।
(vii) संवादात्मक स्वरूप
मौखिक भाषा सामान्यतः संवाद के रूप में प्रयुक्त होती है। इसमें दो या अधिक व्यक्ति भाग लेते हैं और विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। प्रश्नोत्तर तथा चर्चा इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।
(viii) भावनात्मक प्रभाव
उच्चारित भाषा में भावनाओं को अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया जा सकता है। आवाज़ की तीव्रता, लय, गति तथा स्वर भावनाओं को स्पष्ट करते हैं। जैसे क्रोध, प्रेम, दुख या प्रसन्नता को बोलने के तरीके से समझा जा सकता है।
(ix) समय और स्थान पर निर्भरता
उच्चारित भाषा के लिए वक्ता और श्रोता का एक ही समय पर उपस्थित होना आवश्यक होता है। हालांकि आधुनिक तकनीकों जैसे टेलीफोन और इंटरनेट ने इस सीमा को कुछ हद तक कम किया है।
(x) त्रुटियों की संभावना
मौखिक भाषा में बोलते समय गलतियाँ होने की संभावना अधिक रहती है, क्योंकि वक्ता तुरंत सोचकर बोलता है। कभी-कभी शब्दों का गलत उच्चारण या अधूरे वाक्य भी प्रयोग में आ जाते हैं।
2. लिखित भाषा की विशेषताएँ
लिखित भाषा वह भाषा है जिसे लिपि के माध्यम से लिखा और पढ़ा जाता है। यह भाषा का स्थायी और व्यवस्थित रूप है। ज्ञान, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण में लिखित भाषा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(i) लिपि पर आधारित भाषा
लिखित भाषा का आधार लिपि है। इसमें ध्वनियों को चिन्हों और अक्षरों के माध्यम से लिखा जाता है। उदाहरण के लिए हिंदी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है।
(ii) स्थायित्व
लिखित भाषा स्थायी होती है। लिखी हुई सामग्री को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। पुस्तकें, पत्र, दस्तावेज़ और अभिलेख इसके उदाहरण हैं। इसी कारण इतिहास और संस्कृति का संरक्षण संभव हो पाया है।
(iii) विचारपूर्वक अभिव्यक्ति
लिखित भाषा में लेखक को सोचने और संशोधन करने का पर्याप्त समय मिलता है। इसलिए इसमें विचार अधिक स्पष्ट, क्रमबद्ध और व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।
(iv) व्याकरणिक शुद्धता
लिखित भाषा में व्याकरण, वर्तनी और विराम-चिह्नों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इससे भाषा अधिक शुद्ध और प्रभावी बनती है।
(v) औपचारिकता
लिखित भाषा सामान्यतः अधिक औपचारिक होती है। इसमें शिष्ट और मानक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। सरकारी पत्र, समाचार-पत्र, निबंध तथा पुस्तकें इसका उदाहरण हैं।
(vi) स्थायी प्रमाण
लिखित भाषा प्रमाण के रूप में उपयोग की जा सकती है। कानूनी दस्तावेज़, समझौते और सरकारी रिकॉर्ड लिखित रूप में ही मान्य होते हैं। इसलिए इसका सामाजिक और प्रशासनिक महत्व अधिक है।
(vii) ज्ञान का संरक्षण और प्रसार
लिखित भाषा के माध्यम से ज्ञान को सुरक्षित रखा जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जा सकता है। विज्ञान, साहित्य, इतिहास और धर्म से संबंधित ग्रंथ इसी कारण आज उपलब्ध हैं।
(viii) समय और स्थान की स्वतंत्रता
लिखित भाषा का सबसे बड़ा गुण यह है कि लेखक और पाठक का एक ही समय या स्थान पर उपस्थित होना आवश्यक नहीं है। एक व्यक्ति द्वारा लिखा गया संदेश वर्षों बाद भी पढ़ा जा सकता है।
(ix) स्पष्टता और क्रमबद्धता
लिखित भाषा में विचारों को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। अनुच्छेद, शीर्षक और विराम-चिह्न अर्थ को स्पष्ट बनाते हैं। इससे पाठक को समझने में सुविधा होती है।
(x) साहित्यिक विकास का माध्यम
कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक तथा अन्य साहित्यिक विधाओं का विकास लिखित भाषा के कारण संभव हुआ है। लिखित भाषा ने मानव सभ्यता को ज्ञान और संस्कृति की समृद्धि प्रदान की है।
3. उच्चारित और लिखित भाषा में अंतर
| आधार | उच्चारित भाषा | लिखित भाषा |
|---|---|---|
| स्वरूप | ध्वनि पर आधारित | लिपि पर आधारित |
| स्थायित्व | अस्थायी | स्थायी |
| शैली | सरल और अनौपचारिक | औपचारिक और व्यवस्थित |
| व्याकरण | कम ध्यान | अधिक ध्यान |
| संप्रेषण | तात्कालिक | समय और स्थान से स्वतंत्र |
| सहायता | हाव-भाव और स्वर | विराम-चिह्न और लेखन शैली |
| संरक्षण | कठिन | सरल |
निष्कर्ष
उच्चारित और लिखित भाषा दोनों मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उच्चारित भाषा दैनिक जीवन में त्वरित संप्रेषण का माध्यम है, जबकि लिखित भाषा ज्ञान, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण का आधार है। मौखिक भाषा में भावनात्मकता और सहजता अधिक होती है, वहीं लिखित भाषा में स्थायित्व, स्पष्टता और औपचारिकता प्रमुख होती है। दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं और मानव समाज के विकास में समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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