राजनीति विज्ञान में राज्य की प्रकृति और स्वरूप को समझाने के लिए अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं। इनमें उदारवादी तथा मार्क्सवादी दृष्टिकोण सबसे अधिक प्रभावशाली माने जाते हैं। दोनों विचारधाराएँ राज्य की उत्पत्ति, उद्देश्य, कार्य तथा समाज में उसकी भूमिका को अलग-अलग ढंग से व्याख्यायित करती हैं। उदारवादी दृष्टिकोण राज्य को जनहितकारी संस्था मानता है, जबकि मार्क्सवादी दृष्टिकोण इसे वर्ग-शोषण का उपकरण मानता है। अतः राज्य के स्वरूप को समझने के लिए इन दोनों परिप्रेक्ष्यों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।
उदारवादी परिप्रेक्ष्य
उदारवाद का उदय यूरोप में पुनर्जागरण, धर्म-सुधार आंदोलन तथा औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप हुआ। उदारवादी विचारकों में जॉन लॉक, जे. एस. मिल, थॉमस हॉब्स तथा टी. एच. ग्रीन प्रमुख हैं।
उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार राज्य एक आवश्यक एवं कल्याणकारी संस्था है, जिसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, अधिकारों तथा सुरक्षा की रक्षा करना है। प्रारंभिक उदारवादी “न्यूनतम राज्य” के पक्षधर थे। उनके अनुसार राज्य का कार्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना, बाहरी आक्रमण से रक्षा करना तथा अनुबंधों की सुरक्षा करना है। इसे “रात्रि प्रहरी राज्य” कहा गया।
उदारवादी राज्य की प्रमुख विशेषताएँ
- व्यक्ति की सर्वोच्चता - उदारवाद व्यक्ति को समाज और राज्य से अधिक महत्त्व देता है। राज्य व्यक्ति के लिए है, व्यक्ति राज्य के लिए नहीं।
- सीमित सरकार - राज्य की शक्तियों को सीमित रखने पर बल दिया जाता है ताकि नागरिक स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके।
- कानून का शासन - उदारवादी राज्य में सभी नागरिक कानून के समक्ष समान माने जाते हैं। शासन संविधान और विधि के आधार पर चलता है।
- लोकतांत्रिक व्यवस्था - उदारवाद प्रतिनिधि लोकतंत्र, स्वतंत्र चुनाव, बहुदलीय व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करता है।
- कल्याणकारी राज्य की अवधारणा - आधुनिक उदारवादियों ने माना कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। इसलिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा में राज्य की सक्रिय भूमिका आवश्यक है।
उदारवादी दृष्टिकोण का मूल्यांकन
उदारवादी दृष्टिकोण ने मानवाधिकार, लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा दिया। आधुनिक संवैधानिक शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
किन्तु इसकी आलोचना भी की जाती है। आलोचकों के अनुसार उदारवाद आर्थिक असमानता को समाप्त नहीं कर सका। पूँजीवादी व्यवस्था में वास्तविक शक्ति पूँजीपतियों के हाथ में केंद्रित हो जाती है, जिससे समानता केवल औपचारिक रह जाती है। इसी आधार पर मार्क्सवादियों ने उदारवादी राज्य की आलोचना की।
मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य
मार्क्सवादी सिद्धांत का प्रतिपादन कार्ल मार्क्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स ने किया। मार्क्सवाद का आधार ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा वर्ग-संघर्ष का सिद्धांत है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार राज्य कोई निष्पक्ष संस्था नहीं है, बल्कि यह आर्थिक रूप से शक्तिशाली वर्ग के हितों की रक्षा करने वाला उपकरण है। समाज में जिस वर्ग का उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण होता है, वही राज्य-सत्ता पर भी नियंत्रण रखता है।
राज्य की उत्पत्ति के संबंध में मार्क्सवादी दृष्टिकोण
मार्क्सवादियों के अनुसार आदिम साम्यवादी समाज में राज्य का अस्तित्व नहीं था क्योंकि वहाँ वर्ग-विभाजन नहीं था। निजी संपत्ति के विकास के साथ समाज में वर्ग उत्पन्न हुए—शोषक और शोषित। इन वर्ग-विरोधों को नियंत्रित करने तथा शासक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए राज्य की उत्पत्ति हुई।
इस प्रकार दासप्रथा, सामंतवाद और पूँजीवाद—सभी व्यवस्थाओं में राज्य शासक वर्ग का उपकरण रहा है।
पूँजीवादी राज्य का स्वरूप
मार्क्सवादी विचारधारा के अनुसार पूँजीवादी राज्य वास्तव में पूँजीपतियों के हितों की रक्षा करता है। यद्यपि वह लोकतंत्र, समानता और अधिकारों की बात करता है, परंतु व्यवहार में उसकी नीतियाँ पूँजीपति वर्ग को लाभ पहुँचाती हैं। पुलिस, सेना, न्यायपालिका तथा प्रशासन जैसी संस्थाएँ शासक वर्ग के प्रभुत्व को बनाए रखने में सहायता करती हैं।
व्लादिमीर लेनिन ने राज्य को “एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के दमन का यंत्र” कहा। उनके अनुसार पूँजीवादी राज्य को क्रांति द्वारा समाप्त कर सर्वहारा वर्ग की तानाशाही स्थापित करनी होगी।
राज्य का लोप
मार्क्सवाद का अंतिम लक्ष्य वर्गविहीन और राज्यविहीन समाज की स्थापना है। मार्क्स के अनुसार जब वर्ग-संघर्ष समाप्त हो जाएगा और उत्पादन के साधनों पर सामूहिक स्वामित्व स्थापित होगा, तब राज्य की आवश्यकता नहीं रहेगी और उसका “लोप” हो जाएगा।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण का मूल्यांकन
मार्क्सवादी सिद्धांत ने आर्थिक शोषण, वर्ग-संघर्ष और सामाजिक असमानता को उजागर किया। इसने श्रमिक अधिकारों तथा सामाजिक न्याय की चेतना को बढ़ावा दिया।
किन्तु इसकी आलोचना भी हुई। आलोचकों का कहना है कि राज्य को केवल वर्ग-शोषण का उपकरण मानना अत्यधिक संकीर्ण दृष्टिकोण है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में राज्य केवल पूँजीपतियों के हितों की रक्षा नहीं करता, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों की भी सहायता करता है। इसके अतिरिक्त साम्यवादी देशों में भी राज्य का लोप नहीं हुआ, बल्कि कई बार राज्य अधिक शक्तिशाली बन गया।
उदारवादी और मार्क्सवादी दृष्टिकोणों की तुलना
| आधार | उदारवादी दृष्टिकोण | मार्क्सवादी दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| राज्य का स्वरूप | जनहितकारी एवं निष्पक्ष संस्था | वर्ग-शोषण का उपकरण |
| मुख्य उद्देश्य | स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा | शासक वर्ग के हितों की रक्षा |
| व्यक्ति और राज्य संबंध | व्यक्ति सर्वोपरि | वर्ग सर्वोपरि |
| आर्थिक व्यवस्था | पूँजीवाद का समर्थन | पूँजीवाद का विरोध |
| राज्य का भविष्य | स्थायी संस्था | अंततः राज्य का लोप |
निष्कर्ष
उदारवादी और मार्क्सवादी दोनों दृष्टिकोण राज्य के स्वरूप की महत्त्वपूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। उदारवाद राज्य को लोकतंत्र, स्वतंत्रता और जनकल्याण का माध्यम मानता है, जबकि मार्क्सवाद राज्य के पीछे छिपे आर्थिक और वर्गीय हितों को उजागर करता है। आधुनिक राज्य व्यवस्था में दोनों विचारधाराओं का प्रभाव देखा जा सकता है। आज अधिकांश लोकतांत्रिक राज्य उदारवादी राजनीतिक संरचना के साथ-साथ सामाजिक न्याय और कल्याणकारी नीतियों को भी अपनाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि राज्य का वास्तविक स्वरूप बहुआयामी है, जिसे समझने के लिए दोनों दृष्टिकोणों का समन्वित अध्ययन आवश्यक है।
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