Type Here to Get Search Results !

Hollywood Movies

Solved Assignment PDF

Buy NIOS Solved TMA 2025-26!

भारतीय राज्य के संरचनात्मक तथा क्रियात्मक विकास पर एक टिप्पणी लिखिये।

भारतीय राज्य का विकास एक लंबी ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रिया का परिणाम है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने एक लोकतांत्रिक, गणराज्य तथा कल्याणकारी राज्य की स्थापना की। भारतीय राज्य का स्वरूप केवल संवैधानिक संरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि समय के साथ इसके कार्यों और उद्देश्यों में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं। इसलिए भारतीय राज्य के विकास को दो प्रमुख आयामों—संरचनात्मक विकास तथा क्रियात्मक विकास—के आधार पर समझा जा सकता है।

भारतीय राज्य का संरचनात्मक विकास

संरचनात्मक विकास से आशय राज्य की संस्थाओं, शासन प्रणाली तथा संवैधानिक ढाँचे में हुए परिवर्तनों से है।

1. औपनिवेशिक विरासत

भारतीय राज्य की वर्तमान संरचना पर ब्रिटिश शासन का गहरा प्रभाव है। अंग्रेजों ने भारत में केंद्रीकृत प्रशासन, न्यायपालिका, पुलिस व्यवस्था तथा नौकरशाही की स्थापना की। भारत शासन अधिनियम 1935 ने संघीय ढाँचे और प्रांतीय स्वायत्तता की नींव रखी, जो बाद में भारतीय संविधान का आधार बना।

2. संविधान का निर्माण

स्वतंत्रता के बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा ने भारतीय संविधान का निर्माण किया। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और भारत एक “संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य” बना।

भारतीय संविधान ने संसदीय शासन प्रणाली, संघीय व्यवस्था, मौलिक अधिकार, नीति-निर्देशक तत्व तथा स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की।

3. संघीय संरचना का विकास

भारत को “राज्यों का संघ” कहा गया। संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया। प्रारंभ में केंद्र अधिक शक्तिशाली था, लेकिन समय के साथ राज्यों की भूमिका भी मजबूत हुई।

भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन तथा क्षेत्रीय दलों के उदय ने भारतीय संघवाद को अधिक सहभागी और बहुलतावादी बनाया।

4. लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास

भारतीय राज्य की संरचना में संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

समय के साथ लोकतांत्रिक संस्थाएँ अधिक मजबूत हुईं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र को स्थायित्व प्रदान किया।

5. पंचायती राज और विकेंद्रीकरण

73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन भारतीय राज्य के संरचनात्मक विकास में मील का पत्थर सिद्ध हुए। इनके माध्यम से पंचायतों और नगर निकायों को संवैधानिक दर्जा मिला।

इससे लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाने और स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने में सहायता मिली।

6. न्यायपालिका और न्यायिक सक्रियता

भारतीय न्यायपालिका ने संविधान की रक्षा और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ न्यायपालिका अधिक सक्रिय हुई और जनहित याचिका (PIL) जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से शासन में उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया गया।

भारतीय राज्य का क्रियात्मक विकास

क्रियात्मक विकास से आशय राज्य के कार्यों, उद्देश्यों और भूमिका में हुए परिवर्तनों से है।

1. पुलिस राज्य से कल्याणकारी राज्य की ओर

औपनिवेशिक शासन में राज्य का मुख्य उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और राजस्व संग्रह करना था। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्य ने कल्याणकारी राज्य का स्वरूप अपनाया।

अब राज्य का कार्य केवल सुरक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास सुनिश्चित करना भी हो गया।

2. नियोजित विकास की भूमिका

स्वतंत्रता के बाद भारत ने समाजवादी प्रेरणा से मिश्रित अर्थव्यवस्था और नियोजित विकास को अपनाया। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से औद्योगीकरण, कृषि विकास और गरीबी उन्मूलन पर बल दिया गया।

योजना आयोग की स्थापना इसी उद्देश्य से की गई थी। बाद में इसे नीति आयोग द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।

3. सामाजिक न्याय की स्थापना

भारतीय राज्य ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं के उत्थान के लिए आरक्षण, शिक्षा और सामाजिक कल्याण योजनाओं को लागू किया।

राज्य ने सामाजिक असमानताओं को कम करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने का प्रयास किया।

4. आर्थिक उदारीकरण और राज्य की भूमिका

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारतीय राज्य की भूमिका में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों के कारण राज्य प्रत्यक्ष आर्थिक नियंत्रण से हटकर नियामक और सहायक भूमिका में आने लगा।

इसके बावजूद राज्य आज भी गरीबों के कल्याण, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

5. विकास प्रशासन और डिजिटल शासन

आधुनिक काल में भारतीय राज्य विकासोन्मुख प्रशासन की दिशा में आगे बढ़ा है। डिजिटल इंडिया, ई-गवर्नेंस, आधार, ऑनलाइन सेवाओं और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) जैसी व्यवस्थाओं ने प्रशासन को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया है।

6. राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक भूमिका

समय के साथ भारतीय राज्य की भूमिका केवल आंतरिक प्रशासन तक सीमित नहीं रही। राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति, पर्यावरण संरक्षण, साइबर सुरक्षा और वैश्विक सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी राज्य की भूमिका बढ़ी है।

भारत आज एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान बना चुका है।

भारतीय राज्य के विकास की चुनौतियाँ

भारतीय राज्य के विकास के बावजूद अनेक चुनौतियाँ आज भी मौजूद हैं—

  1. भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता
  2. क्षेत्रीय असमानताएँ
  3. जातिवाद और सांप्रदायिकता
  4. गरीबी और बेरोजगारी
  5. केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव
  6. न्यायिक विलंब और राजनीतिक अपराधीकरण

इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता, जनभागीदारी और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

भारतीय राज्य का संरचनात्मक और क्रियात्मक विकास निरंतर परिवर्तनशील प्रक्रिया रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने लोकतंत्र, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय पर आधारित आधुनिक राज्य की स्थापना की। समय के साथ राज्य की संस्थाएँ अधिक सुदृढ़ हुईं और उसकी भूमिका केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित न रहकर विकास एवं कल्याण तक विस्तृत हो गई। यद्यपि अनेक चुनौतियाँ आज भी विद्यमान हैं, फिर भी भारतीय राज्य ने लोकतांत्रिक स्थिरता, सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक विकास की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। अतः भारतीय राज्य का विकास विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सफलता का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।

Subscribe on YouTube - NotesWorld

For PDF copy of Solved Assignment

Any University Assignment Solution

WhatsApp - 9113311883 (Paid)

Post a Comment

0 Comments
* Please Don't Spam Here. All the Comments are Reviewed by Admin.

Technology

close