महात्मा गांधी भारतीय समाज के सबसे महान और प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त असमानताएँ, खासकर अस्पृश्यता (जो आज के समय में "दलित" या "हरिजन" के रूप में संदर्भित की जाती है), के खिलाफ जीवनभर संघर्ष किया। गांधी जी का मानना था कि अस्पृश्यता केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक और धार्मिक समस्या थी। उन्होंने इसे भारतीय समाज में व्याप्त अमानवीयता और अन्याय के रूप में देखा, और इसे समाप्त करने के लिए उन्होंने कई आंदोलन, विचारधारा और संघर्षों का नेतृत्व किया।
गांधी जी का अस्पृश्यता के प्रति दृष्टिकोण उनकी पूरी जीवन-यात्रा में परिवर्तित हुआ, लेकिन उनका प्रमुख उद्देश्य यह था कि हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलें, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ण का हो।
1. अस्पृश्यता का विरोध और गांधी जी का दृष्टिकोण
गांधी जी ने अस्पृश्यता को न केवल भारतीय समाज के लिए एक कलंक माना, बल्कि इसे धार्मिक और नैतिक दृष्टिकोण से भी गलत समझा। उनके अनुसार, अस्पृश्यता की अवधारणा ने भारतीय समाज को न केवल भेदभाव और अन्याय का शिकार बनाया, बल्कि इसने भारतीय संस्कृति की महानता को भी धूमिल किया था। गांधी जी के लिए, अस्पृश्यता का मतलब न केवल शारीरिक दूरी, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक दूरी भी थी, जिसे समाप्त करने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किए।
गांधी जी का मानना था कि धर्म और समाज का उद्देश्य व्यक्ति की आत्मा की उन्नति और उसके सर्वांगीण विकास के लिए होना चाहिए, न कि उसे भेदभाव और अपमानित करने के लिए। वे मानते थे कि हर व्यक्ति ईश्वर की रचना है और इसलिए हर व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि "यदि हमें भगवान को प्रेम करना है, तो हमें सबसे पहले उन सभी को प्रेम करना होगा, जिन्हें समाज ने तिरस्कृत किया है।"
2. 'हरिजन' शब्द और अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष
गांधी जी ने अस्पृश्यता के खिलाफ अपनी पूरी जिंदगी संघर्ष किया और इस संदर्भ में उन्होंने 'हरिजन' शब्द का इस्तेमाल किया। "हरिजन" का अर्थ था "ईश्वर का व्यक्ति", जो उन्होंने अस्पृश्यों के लिए अपनाया था। उनका मानना था कि अस्पृश्य वर्ग को "नीच" या "अस्वीकार्य" मानने का कोई धार्मिक या नैतिक आधार नहीं है।
गांधी जी ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पृश्यता केवल जातिवाद का हिस्सा नहीं थी, बल्कि यह एक सामाजिक और धार्मिक विकृति थी, जो भारतीय समाज में गहरे तक फैली हुई थी। इसके खिलाफ उन्होंने भारतीय समाज को जागरूक किया और विभिन्न धार्मिक नेताओं से इस विषय पर समर्थन मांगा। गांधी जी के अनुसार, यदि भारतीय समाज को सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और समृद्ध बनाना है, तो अस्पृश्यता को समाप्त करना आवश्यक था।
3. अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन
गांधी जी ने अस्पृश्यता के खिलाफ कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। सबसे प्रसिद्ध आंदोलन था "हरिजन आंदोलन"। इस आंदोलन के तहत, गांधी जी ने अस्पृश्यों को समाज में समान अधिकार दिलाने के लिए कई कदम उठाए। उन्होंने हरिजनों के लिए सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश, मंदिरों में पूजा, और शिक्षा की सुविधाओं का अधिकार मांगा। गांधी जी के अनुसार, यदि अस्पृश्यता को समाप्त करना है, तो समाज को अपनी मानसिकता और दृष्टिकोण में बदलाव लाना होगा।
इसके अलावा, गांधी जी ने 1932 में "पुणे पैक्ट" के माध्यम से भी अस्पृश्यों के अधिकारों की सुरक्षा की। पुणे पैक्ट के दौरान, गांधी जी ने गांधी-आम्बेडकर विवाद के समाधान के रूप में अस्पृश्यों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था को समाप्त करने का समर्थन किया और इसके बदले उन्हें आरक्षित सीटों पर प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव रखा। इस समझौते ने भारतीय राजनीति में दलितों के अधिकारों के लिए एक नया रास्ता खोला।
4. अस्पृश्यता के खिलाफ धार्मिक दृष्टिकोण
गांधी जी का विश्वास था कि अस्पृश्यता का विरोध केवल सामाजिक स्तर पर नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टिकोण से भी किया जाना चाहिए। उन्होंने हिंदू धर्म में सुधार की आवश्यकता को महसूस किया और इसके लिए उन्होंने "हिंदू धर्म में जातिवाद और अस्पृश्यता के लिए कोई जगह नहीं है" की बात की। उनका कहना था कि यदि हिंदू धर्म में सचमुच कोई सार्थकता है, तो उसे उन लोगों की सेवा करनी चाहिए जिन्हें समाज ने तिरस्कृत किया है।
गांधी जी का यह भी मानना था कि एक सच्चा हिंदू वही है जो "सर्वजनहिताय" यानी सभी के कल्याण के लिए काम करता है। उन्होंने यह विचारधारा अपने अनुयायियों और समाज के अन्य लोगों में फैलाने का प्रयास किया, ताकि अस्पृश्यता को धार्मिक दृष्टिकोण से नष्ट किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि, "जो लोग स्वयं को पवित्र मानते हैं, वे दूसरों के साथ नफरत करने का कोई अधिकार नहीं रखते।"
5. गांधी जी के विचारों का प्रभाव
गांधी जी के अस्पृश्यता विरोधी विचारों का भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके विचारों ने न केवल भारतीय समाज में सुधार की प्रक्रिया को गति दी, बल्कि उन्होंने विश्वभर में इस मुद्दे पर ध्यान आकर्षित किया। महात्मा गांधी की मानवीयता, अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों ने न केवल भारतीय समाज को प्रभावित किया, बल्कि उन्होंने यह सिखाया कि किसी भी व्यक्ति को उसके जन्म, जाति, या सामाजिक स्थिति के आधार पर तिरस्कृत या अपमानित नहीं किया जा सकता।
गांधी जी के विचारों ने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई, जिसमें अस्पृश्यता का विरोध किया गया और प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार दिए गए। डॉ. भीमराव अंबेडकर, जो कि एक प्रमुख दलित नेता थे, ने भी गांधी जी के साथ मिलकर भारतीय समाज के अस्पृश्यता उन्मूलन की दिशा में कई कदम उठाए।
निष्कर्ष
महात्मा गांधी के अस्पृश्यता संबंधी विचार केवल भारतीय समाज के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण थे। उन्होंने यह सिद्ध किया कि समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव और असमानता केवल सामाजिक, मानसिक और धार्मिक दृष्टिकोण से गलत है। उनके संघर्ष और विचारों ने न केवल भारतीय समाज में बदलाव की लहर पैदा की, बल्कि पूरे दुनिया में समानता और मानवाधिकारों के लिए जागरूकता फैलाने का कार्य किया। गांधी जी का यह योगदान आज भी भारतीय समाज में अत्यधिक प्रासंगिक है, और उनकी यह शिक्षाएँ हमें आज भी जातिवाद और अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं।
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