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भारतीय समाज एवं संस्कृति पर तीन प्रमुख पश्चिमी दृष्टिकोणों का वर्णन कीजिए तथा आकलन कीजिए कि भारत में 20 समाजशास्त्र के उद्धव एवं विकास में उन्होंने किस प्रकार योगदान दिया।

भारतीय समाज और संस्कृति का अध्ययन करने में पश्चिमी दृष्टिकोणों का अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। विशेष रूप से 19वीं और 20वीं शताब्दी में, जब भारतीय समाजशास्त्र के विकास की नींव रखी जा रही थी, पश्चिमी विचारधारा और दृष्टिकोण ने भारतीय समाजशास्त्रियों और शोधकर्ताओं पर गहरा प्रभाव डाला। यह दृष्टिकोण भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं को समझने में सहायक रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी देखा गया कि इन दृष्टिकोणों ने भारतीय समाज के पारंपरिक ढांचे और संस्कृति को समझने में अपने सीमा और आलोचनाएं भी प्रस्तुत की हैं।

यह लेख भारतीय समाज और संस्कृति पर तीन प्रमुख पश्चिमी दृष्टिकोणों का वर्णन करेगा और इसके बाद उनके समाजशास्त्र में योगदान का आकलन करेगा। ये दृष्टिकोण हैं: सामाजिक उत्क्रमणवाद (Social Evolutionism), कार्यात्मकवाद (Functionalism), और मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist Approach)

1. सामाजिक उत्क्रमणवाद (Social Evolutionism)

सामाजिक उत्क्रमणवाद का सिद्धांत मुख्य रूप से पश्चिमी समाजशास्त्रियों जैसे हर्बर्ट स्पेन्सर, एडवर्ड बर्नेट टायलर, और लियोटार्ड द्वारा विकसित किया गया था। इस दृष्टिकोण के अनुसार, समाजों का विकास एक क्रमिक प्रक्रिया के रूप में होता है, जिसमें समाज पहले "प्रारंभिक" और "अलंकृत" अवस्था से "संपन्न" और "सभ्य" अवस्था की ओर बढ़ता है। इस सिद्धांत का तात्पर्य यह था कि सभी समाज एक समान मार्ग से गुजरते हुए, अधिक आधुनिक और उन्नत समाज बन जाते हैं।

स्पेन्सर और अन्य उत्क्रमणवादियों ने भारतीय समाज को एक "निम्न" स्थिति में रखा और इसे अधिक उन्नत पश्चिमी समाजों के समान विकास के लिए समय की आवश्यकता के रूप में देखा। वे भारतीय समाज की परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और संस्कृतियों को विकास की प्रक्रिया में रुकावट मानते थे।

भारतीय समाजशास्त्र में योगदान:

सामाजिक उत्क्रमणवाद ने भारतीय समाज की समझ में कुछ महत्वपूर्ण विचार दिए। इस दृष्टिकोण के माध्यम से भारतीय समाज को पश्चिमी समाजों के समान समझने और उसकी स्थिति का आकलन करने की एक प्रक्रिया विकसित की गई। इसने भारतीय समाज को समय के साथ विकसित होने वाली एक श्रृंखला के रूप में देखा, हालांकि इस दृष्टिकोण में भारतीय समाज की वास्तविक जटिलताओं और विशिष्टताओं की उपेक्षा की गई।

उदाहरण के तौर पर, मार्क्स और डुरकाइम जैसे समाजशास्त्रियों ने भारतीय समाज के परंपरागत ढांचे और जाति व्यवस्था को सामाजिक विकास के विभिन्न चरणों के रूप में देखा। इससे भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन और विकास के अध्ययन में मदद मिली, लेकिन यह दृष्टिकोण एकतरफा था और इसमें भारतीय समाज की पारंपरिक संरचनाओं को नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा गया।

2. कार्यात्मकवाद (Functionalism)

कार्यात्मकवाद एक और महत्वपूर्ण पश्चिमी दृष्टिकोण था, जिसका विकास एमिल डुरकाइम और तार्दे जैसे समाजशास्त्रियों द्वारा हुआ। कार्यात्मक दृष्टिकोण के अनुसार, समाज को एक जटिल प्रणाली के रूप में देखा जाता है, जिसमें विभिन्न संस्थाएँ (जैसे परिवार, धर्म, शिक्षा, आदि) एक दूसरे के साथ काम करती हैं, ताकि समाज का सामूहिक उद्देश्य पूरा हो सके। हर एक संस्था का एक विशेष कार्य होता है, जो समाज के स्थिरता और सामंजस्य को बनाए रखने में मदद करता है।

डुरकाइम ने भारतीय समाज के धार्मिक और सामाजिक ढांचे को कार्यात्मक दृष्टिकोण से देखा। उन्होंने जाति व्यवस्था को समाज के सामाजिक और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक माना। उनके अनुसार, प्रत्येक जाति और वर्ग का समाज में अपना कार्य था, और यह कार्य समाज के सामूहिक भले के लिए आवश्यक था।

भारतीय समाजशास्त्र में योगदान:

कार्यात्मकवाद ने भारतीय समाज में विभिन्न संस्थाओं की भूमिका को समझने में मदद की, जैसे परिवार, धर्म, और जाति व्यवस्था। इस दृष्टिकोण ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में प्रत्येक संस्था का एक विशेष कार्य है, जो समाज की स्थिरता में योगदान करता है।

हालांकि, आलोचनाओं का सामना भी किया गया, क्योंकि यह दृष्टिकोण सामाजिक असमानताओं को सही ठहराता था, जैसे जातिवाद, लिंग असमानता, और सामंतवादी व्यवस्था। गोकुलनाथ दास, राममनोहर लोहिया, और भीमराव अंबेडकर जैसे भारतीय समाजशास्त्रियों ने इस दृष्टिकोण की आलोचना की, क्योंकि वे इसे भारतीय समाज में उत्पन्न होने वाली असमानताओं और दबावों को नजरअंदाज करने वाला मानते थे।

इस दृष्टिकोण का सकारात्मक पक्ष यह था कि इसने भारतीय समाज में संरचनात्मक और कार्यात्मक दृष्टिकोण से बदलावों को समझने में मदद की, और समाज के विभिन्न तत्वों के बीच के रिश्तों की पहचान की।

3. मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist Approach)

मार्क्सवादी दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण पश्चिमी समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण था, जो कार्ल मार्क्स और उनके अनुयायियों द्वारा विकसित किया गया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, समाजों की ऐतिहासिक प्रगति वर्ग संघर्ष (Class Struggle) और आर्थिक संरचना (Economic Structure) के आधार पर होती है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने भारतीय समाज की असमानताओं को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मार्क्स ने भारतीय समाज को सामंती और उपनिवेशी संरचनाओं के रूप में देखा, जहाँ सामंती वर्ग और धार्मिक शक्तियाँ मुख्य रूप से समाज पर हावी थीं। उन्होंने भारतीय समाज को वर्गीय संघर्ष और सामाजिक न्याय की लेंस से देखा, और यह बताया कि भारतीय समाज में उत्पन्न होने वाली असमानताएँ, शोषण और उत्पीड़न का कारण थे।

भारतीय समाजशास्त्र में योगदान:

मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने भारतीय समाज में वर्ग संघर्ष, आर्थिक असमानताएँ, और शोषण को प्रमुख रूप से सामने रखा। इस दृष्टिकोण ने भारतीय समाज में सामंती ढांचे, उपनिवेशवाद, और धार्मिक असमानताओं को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उदाहरण के तौर पर, भीमराव अंबेडकर और राममनोहर लोहिया ने मार्क्सवादी दृष्टिकोण को अपनाया और भारतीय समाज में जातिवाद और धार्मिक असमानता को समाप्त करने की दिशा में काम किया।

मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने भारतीय समाज में सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत को समझने में मदद की और यह स्पष्ट किया कि भारत के विकास के लिए सामाजिक न्याय और वर्गीय संघर्ष को प्रमुख ध्यान में रखना आवश्यक है।

निष्कर्ष

भारतीय समाज और संस्कृति पर पश्चिमी दृष्टिकोणों का प्रभाव गहरा था, और इनमें से प्रत्येक दृष्टिकोण ने भारतीय समाजशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सामाजिक उत्क्रमणवाद ने समाज के विकास के अनुक्रम को समझने में मदद की, जबकि कार्यात्मकवाद ने भारतीय समाज के विभिन्न संस्थाओं की कार्यप्रणाली को समझने में सहायता की। मार्क्सवादी दृष्टिकोण ने भारतीय समाज में असमानताओं और शोषण के सवालों को महत्वपूर्ण तरीके से उठाया।

हालांकि, इन पश्चिमी दृष्टिकोणों की आलोचना भी की गई, क्योंकि ये भारतीय समाज की विशिष्टताओं और सांस्कृतिक विविधताओं को न समझने वाले थे। फिर भी, इन दृष्टिकोणों ने भारतीय समाजशास्त्र को गहराई से प्रभावित किया और भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं पर नए विचार और शोध की राह खोली।

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