तोंगझी पुनर्स्थापना और स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन (1861-1874)
चीन का तोंगझी पुनर्स्थापना (Tongzhi Restoration) और स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन (Self-strengthening Movement) 19वीं सदी के मध्य में हुआ और यह क्विंग साम्राज्य के अस्तित्व और उसकी शक्ति को बनाए रखने के प्रयासों का हिस्सा था। तोंगझी पुनर्स्थापना 1861 में तोंगझी सम्राट (Tongzhi Emperor) के शासनकाल के दौरान शुरू हुआ था, और यह प्रमुख रूप से साम्राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति को सुधारने और विदेशी ताकतों के बढ़ते प्रभाव से बचने के लिए एक प्रयास था। स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन तोंगझी पुनर्स्थापना के दौरान विकसित हुआ, जिसमें चीन ने पश्चिमी विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सैन्य सुधारों को अपनाने की कोशिश की।
इस लेख में हम तोंगझी पुनर्स्थापना और स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे और देखेंगे कि किस प्रकार इन दोनों ने चीन के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे को प्रभावित किया।
1. तोंगझी पुनर्स्थापना (1861-1874):
(a) तोंगझी सम्राट और पुनर्स्थापना का उद्देश्य:
तोंगझी पुनर्स्थापना का प्रारंभ 1861 में हुआ, जब तोंगझी सम्राट के शासनकाल की शुरुआत हुई। तोंगझी सम्राट केवल पांच साल के थे जब उन्होंने सिंहासन पर बैठा, और इस कारण से शासन का वास्तविक नियंत्रण उनके माता-पिता और मंत्रियों के हाथ में था। यह अवधि, हालांकि, क्विंग साम्राज्य के भीतर राजनीतिक अस्थिरता का दौर था, खासकर ताइपिंग विद्रोह (1850-1864) और अन्य आंतरिक विद्रोहों के कारण। इन विद्रोहों ने साम्राज्य की शक्ति को कमजोर कर दिया था और देश को विदेशी शक्तियों के हमलों का सामना करना पड़ा था।
तोंगझी पुनर्स्थापना का मुख्य उद्देश्य साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति को फिर से स्थापित करना था, ताकि चीन विदेशी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव और आंतरिक अशांति से बच सके। यह पुनर्स्थापना मुख्य रूप से चीन के सम्राट और उनके दरबारियों के बीच साम्राज्य के प्रशासन को स्थिर करने के प्रयासों के रूप में उभरी।
(b) पुनर्स्थापना के प्रमुख तत्व:
- केंद्रीय सत्ता की पुनः स्थापना: तोंगझी सम्राट के माता-पिता और मुख्य मंत्रियों ने केंद्रीय सत्ता को पुनर्स्थापित करने के लिए प्रयास किए। इसके तहत साम्राज्य के प्रशासनिक ढांचे में सुधार किया गया और भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश की गई।
- विदेशी प्रभाव का प्रतिरोध: तोंगझी पुनर्स्थापना के दौरान चीन ने पश्चिमी शक्तियों, विशेषकर ब्रिटेन और फ्रांस, के बढ़ते प्रभाव का प्रतिकार करने के लिए अपनी सैन्य और कूटनीतिक नीतियों में बदलाव किया। हालांकि, पश्चिमी शक्तियों के साथ युद्ध में चीन की हार के कारण यह काम ज्यादा प्रभावी नहीं हो सका।
- सामाजिक सुधार: सामाजिक और आर्थिक सुधारों की दिशा में भी कुछ प्रयास किए गए। इस समय में चीन के शासकों ने प्रशासनिक सुधारों और विधायिका के सुधार की आवश्यकता महसूस की, ताकि शोषण और भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सके।
2. स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन (Self-Strengthening Movement):
स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन, जो तोंगझी पुनर्स्थापना के दौरान ही विकसित हुआ, चीन के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार आंदोलन था। यह आंदोलन मुख्य रूप से चीन को पश्चिमी तकनीक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी से सशक्त बनाने का था, ताकि चीन पश्चिमी देशों के मुकाबले अपनी सैन्य और औद्योगिक ताकत को बढ़ा सके।
(a) स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन का उद्देश्य:
स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन का मुख्य उद्देश्य था कि चीन अपनी पारंपरिक सामंती व्यवस्था और तंत्र से बाहर निकलकर पश्चिमी देशों की तरह औद्योगिक और सैन्य दृष्टिकोण से सशक्त बने। यह आंदोलन पश्चिमी ताकतों के खिलाफ आत्म-निर्भरता, राष्ट्रीय सुरक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा था।
(b) स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन की विशेषताएँ:
- प्रौद्योगिकी और उद्योग का विकास: इस आंदोलन के तहत चीन ने पश्चिमी देशों से शस्त्रास्त्रों, औद्योगिक मशीनों और तकनीकी ज्ञान को अपनाया। शंघाई और नानजिंग जैसे प्रमुख शहरों में शस्त्र निर्माण कारख़ाने, रेलवे और संचार नेटवर्क की स्थापना की गई।
- पश्चिमी शिक्षा का प्रचार: पश्चिमी शिक्षा प्रणाली को अपनाने की कोशिश की गई। इसके तहत चीन में पश्चिमी विज्ञान, गणित और इंजीनियरिंग के शिक्षण संस्थान खोले गए। कुछ चीनी अधिकारियों और विद्वानों को यूरोप और अमेरिका भेजा गया ताकि वे पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
- सैन्य सुधार: चीन ने अपनी सेना को पश्चिमी तरीके से संगठित करने की कोशिश की। सैनिकों को पश्चिमी शैली की ट्रेनिंग दी गई, और नए प्रकार के हथियारों, जैसे बंदूकें और तोपें, को अपनाया गया। तोंगझी सम्राट के शासन में चीन ने अपनी नौसेना को भी मजबूत करने की कोशिश की, और इसके लिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद ली गई।
- कूटनीतिक सुधार: स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन के दौरान चीन ने अपनी कूटनीतिक नीतियों में भी सुधार किए। चीन ने विभिन्न पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को सुधारने और बेहतर कूटनीतिक संबंध स्थापित करने की कोशिश की।
(c) स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन के परिणाम:
स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन ने चीन में कुछ हद तक सैन्य और औद्योगिक सुधार किए, लेकिन यह पूरी तरह से सफल नहीं हो सका। पश्चिमी ताकतों के मुकाबले चीन की स्थिति में कोई बड़ी स्थिरता नहीं आई, और साम्राज्य के भीतर भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की समस्याएँ बनी रहीं। इसके अलावा, आंदोलन के अंतर्गत किए गए सुधारों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण थे। कुछ चीनी अधिकारी चाहते थे कि चीन पूरी तरह से पश्चिमी तरीके अपनाए, जबकि अन्य पारंपरिक चीनी संस्कृति और राजनीति को बनाए रखने के पक्ष में थे।
3. निष्कर्ष:
तोंगझी पुनर्स्थापना और स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन ने चीन के साम्राज्यवादी और सामाजिक ढांचे को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। हालांकि ये सुधार व्यापक और प्रभावी नहीं हो सके, लेकिन इन दोनों ने चीन के आधुनिकization की दिशा में कुछ कदम बढ़ाए। तोंगझी पुनर्स्थापना और स्वयं-सशक्तिकरण आंदोलन ने चीन को आंतरिक असंतोष और विदेशी दबावों के बावजूद अपने अस्तित्व को बनाए रखने की कोशिश की। इसके बावजूद, ये प्रयास पर्याप्त नहीं थे और अंततः चीन को 20वीं सदी की शुरुआत में और भी बड़े बदलावों का सामना करना पड़ा।
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