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खाड़ी क्षेत्र में भारतीय डायस्पोरा के प्रवासन पैटर्न (migration patterns) का वर्णन करें।

खाड़ी क्षेत्र में भारतीय डायस्पोरा के प्रवासन पैटर्न

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश - सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान - दशकों से भारतीय प्रवासियों के लिए एक प्रमुख गंतव्य रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र में भारतीय डायस्पोरा का प्रवासन पैटर्न विशिष्ट कारकों और प्रवृत्तियों द्वारा चिह्नित है जो इसे दुनिया के अन्य हिस्सों में भारतीय प्रवासन से अलग करते हैं। यह प्रवासन मुख्य रूप से आर्थिक अवसरों, भौगोलिक निकटता और ऐतिहासिक संबंधों से प्रेरित है।

खाड़ी क्षेत्र में भारतीय प्रवासन के प्रमुख पैटर्न:

1. "अस्थायी" या चक्रीय प्रवासन (Temporary or Circular Migration):

  • खाड़ी क्षेत्र में भारतीय प्रवासियों का सबसे विशिष्ट पैटर्न उनकी अस्थायी प्रकृति है। अधिकांश प्रवासी "अतिथि श्रमिक" (guest workers) के रूप में आते हैं, जिनके पास आमतौर पर प्रायोजन (कफाला प्रणाली) पर आधारित अल्पकालिक रोजगार अनुबंध होते हैं।
  • इनके पास स्थायी निवास या नागरिकता प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं होता है। वे आम तौर पर कुछ वर्षों के लिए काम करते हैं, अपने परिवारों को पैसे भेजते हैं, और फिर स्वदेश लौट जाते हैं, या तो नवीनीकृत अनुबंधों के साथ या पूरी तरह से।
  • यह चक्रीय पैटर्न खाड़ी देशों की श्रम बाजार की आवश्यकताओं और उनकी सख्त आव्रजन नीतियों का परिणाम है।

2. मुख्य रूप से पुरुष श्रमिक (Predominantly Male Workforce):

  • प्रारंभिक चरणों में, और अभी भी काफी हद तक, खाड़ी में भारतीय प्रवासी कार्यबल मुख्य रूप से पुरुषों का बना होता है। ये पुरुष अक्सर अपने परिवारों को भारत में छोड़कर अकेले यात्रा करते हैं।
  • महिला प्रवासियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन वे अक्सर विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे स्वास्थ्य सेवा, घरेलू सहायता) में केंद्रित होती हैं।

3. विभिन्न कौशल स्तरों का मिश्रण (Mix of Various Skill Levels):

  • खाड़ी में भारतीय प्रवासी कार्यबल में उच्च कुशल पेशेवरों (डॉक्टर, इंजीनियर, आईटी विशेषज्ञ, प्रबंधक) से लेकर अर्ध-कुशल (पर्यवेक्षक, तकनीशियन, प्रशासक) और अकुशल श्रमिक (निर्माण श्रमिक, घरेलू सहायक, ड्राइवर) तक सभी कौशल स्तरों के लोग शामिल हैं।
  • हालांकि, कुल संख्या में अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा है, जो निर्माण, तेल और गैस, खुदरा और आतिथ्य जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं।

4. तेजी से बढ़ता सेवा क्षेत्र और व्यावसायिक भूमिकाएँ (Growing Service Sector and Professional Roles):

  • जबकि निर्माण और तेल क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से प्रमुख नियोक्ता रहे हैं, हाल के वर्षों में सेवा क्षेत्र, खुदरा, आतिथ्य, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में भारतीय प्रवासियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • यह खाड़ी देशों के आर्थिक विविधीकरण और भारत में बढ़ती शैक्षिक आकांक्षाओं को दर्शाता है। उच्च-कुशल पेशेवरों और सफेदपोश कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि हुई है।

5. दक्षिण भारतीय राज्यों से प्रमुखता (Predominance from South Indian States):

  • ऐतिहासिक रूप से, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश (अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) और कर्नाटक जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों से प्रवासियों की संख्या अधिक रही है। इन राज्यों के पास खाड़ी देशों के साथ समुद्री व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक लंबा इतिहास है।
  • हालांकि, हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और पंजाब जैसे उत्तर भारतीय राज्यों से भी प्रवासियों की संख्या में वृद्धि हुई है।

6. कफाला प्रणाली का प्रभाव (Impact of the Kafala System):

  • खाड़ी देशों में प्रचलित कफाला (प्रायोजन) प्रणाली का प्रवासन पैटर्न पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह प्रणाली प्रवासियों को उनके नियोक्ताओं (प्रायोजकों) से कानूनी रूप से बांधती है, जिससे उनकी गतिशीलता सीमित हो जाती है और उनके अधिकारों पर कुछ हद तक प्रभाव पड़ता है।
  • यह प्रणाली प्रवासियों को एक नियोक्ता से दूसरे में स्थानांतरित होने या स्पॉन्सर की अनुमति के बिना देश छोड़ने से रोकती है, जिससे कुछ प्रवासियों के लिए शोषण और दुर्व्यवहार का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, कुछ खाड़ी देशों में सुधार हो रहे हैं।

7. प्रेषण (Remittances) का उच्च स्तर (High Levels of Remittances):

  • खाड़ी में भारतीय प्रवासियों का एक प्रमुख उद्देश्य अपने परिवारों को पैसे भेजना है। भारत दुनिया में प्रेषण का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता है, और खाड़ी क्षेत्र से आने वाले प्रेषण इसका एक बड़ा हिस्सा हैं।
  • यह पैटर्न भारत में ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन लाता है, जिसमें परिवारों के जीवन स्तर में सुधार होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।

8. समुदायों का विकास (Development of Communities):

  • हालांकि प्रवासन अस्थायी होता है, खाड़ी देशों में मजबूत भारतीय प्रवासी समुदायों का विकास हुआ है। इन समुदायों के अपने सांस्कृतिक केंद्र, स्कूल, मंदिर और सामाजिक संगठन हैं।
  • ये समुदाय प्रवासियों को सामाजिक समर्थन प्रदान करते हैं, उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने में मदद करते हैं, और उन्हें एक-दूसरे से जुड़ने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।

9. आर्थिक मंदी और नीतिगत परिवर्तनों के प्रति संवेदनशीलता (Vulnerability to Economic Downturns and Policy Changes):

  • तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, खाड़ी देशों की स्थानीयकरण नीतियां (जैसे सऊदीकरण, अमीरातकरण) और आर्थिक मंदी से प्रवासन पैटर्न सीधे प्रभावित होते हैं।
  • इन परिवर्तनों के कारण प्रवासियों के लिए नौकरी के अवसर कम हो सकते हैं, वेतन में कटौती हो सकती है या उन्हें स्वदेश लौटना पड़ सकता है, जैसा कि COVID-19 महामारी के दौरान देखा गया था।

10. पुनर्वास और सामाजिक पुनर्समायोजन (Re-migration and Social Re-adjustment):

  • खाड़ी से लौटने वाले प्रवासियों को अक्सर अपने घर देशों में सामाजिक और आर्थिक पुनर्समायोजन की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • प्रेषण से प्राप्त धन का उपयोग अक्सर घर बनाने, छोटे व्यवसाय शुरू करने या बच्चों की शिक्षा के लिए किया जाता है। हालांकि, कुछ को अपनी नई सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समायोजित करने में कठिनाई होती है।

निष्कर्ष:

खाड़ी क्षेत्र में भारतीय डायस्पोरा का प्रवासन पैटर्न अद्वितीय है, जो मुख्य रूप से अस्थायी श्रम प्रवासन, पुरुष-प्रधान कार्यबल, विविध कौशल मिश्रण और दक्षिण भारतीय राज्यों से उच्च भागीदारी की विशेषता है। यह पैटर्न खाड़ी देशों की श्रम आवश्यकताओं, आव्रजन नीतियों और भारत से प्रवासियों की आर्थिक प्रेरणाओं से गहराई से प्रभावित है। जबकि यह प्रेषण के माध्यम से भारत के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ लाता है, यह प्रवासियों के लिए चुनौतियों और मेजबान देशों की नीतियों के प्रति संवेदनशीलता को भी दर्शाता है। यह एक गतिशील प्रवासन प्रणाली है जो क्षेत्रीय और वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

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