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धर्म पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की चर्चा कीजिए।

धर्म पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण को समझने के लिए, हमें विभिन्न समाजशास्त्रियों के सिद्धांतों और विचारों की पड़ताल करनी होगी, जिन्होंने धर्म को सामाजिक संरचना, कार्यप्रणाली और परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में देखा है।

धर्म की समाजशास्त्रीय परिभाषा:

समाजशास्त्र में, धर्म को अक्सर विश्वासों, अनुष्ठानों और नैतिक मूल्यों की एक संगठित प्रणाली के रूप में परिभाषित किया जाता है जो पवित्र और अलौकिक से संबंधित होती है। यह व्यक्तियों को एक समुदाय में बांधता है और उन्हें जीवन के अर्थ, उद्देश्य और नैतिकता के बारे में एक साझा समझ प्रदान करता है। धर्म केवल व्यक्तिगत विश्वास का मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है जो सामाजिक संरचनाओं, मानदंडों और व्यवहारों को प्रभावित करता है।

क्लासिक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण:

धर्म के समाजशास्त्र में तीन प्रमुख संस्थापक आंकड़े हैं जिन्होंने इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए: एमील दुर्खीम, कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर।

1. एमील दुर्खीम (Émile Durkheim): दुर्खीम ने अपनी प्रसिद्ध कृति "द एलिमेंट्री फॉर्म्स ऑफ द रिलीजियस लाइफ" (The Elementary Forms of the Religious Life) में धर्म को एक सामाजिक तथ्य के रूप में देखा। उनके अनुसार, धर्म का प्राथमिक कार्य समाज को एकजुट करना और सामूहिक चेतना को बनाए रखना है।

  • पवित्र और अपवित्र: दुर्खीम ने "पवित्र" (sacred) और "अपवित्र" (profane) के बीच अंतर किया। पवित्र वे वस्तुएं, विश्वास और अनुष्ठान हैं जिन्हें समाज द्वारा असाधारण और सम्मानजनक माना जाता है, जबकि अपवित्र वे सामान्य और सांसारिक चीजें हैं। धर्म पवित्र की पूजा के माध्यम से सामाजिक एकजुटता पैदा करता है।
  • सामूहिक उत्तेजना (Collective Effervescence): दुर्खीम का मानना था कि अनुष्ठानों और समारोहों के दौरान लोग सामूहिक उत्तेजना का अनुभव करते हैं, जहां वे एक बड़ी इकाई का हिस्सा महसूस करते हैं। यह अनुभव उन्हें समाज की शक्ति और महत्व का एहसास कराता है, जिससे सामाजिक बंधन मजबूत होते हैं।
  • धर्म का मूल: दुर्खीम के लिए, धर्म वास्तव में समाज की ही पूजा है। जब लोग देवताओं या अलौकिक शक्तियों की पूजा करते हैं, तो वे अनजाने में उस सामाजिक शक्ति और व्यवस्था की पूजा कर रहे होते हैं जो उनके जीवन को आकार देती है।

दुर्खीम के अनुसार, धर्म सामाजिक व्यवस्था और सामंजस्य के लिए आवश्यक है। यह सामाजिक मानदंडों को सुदृढ़ करता है और व्यक्तियों को एक साझा नैतिक ढांचा प्रदान करता है।

2. कार्ल मार्क्स (Karl Marx): मार्क्स ने धर्म को सामाजिक नियंत्रण और यथास्थिति बनाए रखने के एक साधन के रूप में देखा। उनके लिए, धर्म पूंजीवादी समाज में उत्पीड़न और असमानता को छुपाने का एक उपकरण था।

  • "जनता की अफीम" (Opium of the People): मार्क्स का सबसे प्रसिद्ध कथन है कि धर्म "जनता की अफीम" है। इसका अर्थ है कि धर्म लोगों को उनके दुख और शोषण से अस्थायी राहत प्रदान करता है, उन्हें एक बेहतर परलोक का वादा करके वर्तमान जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। यह उन्हें सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ने से रोकता है।
  • वर्ग संघर्ष (Class Struggle): मार्क्स के विश्लेषण में, धर्म शासक वर्ग के हितों की सेवा करता है। यह गरीबों को यह विश्वास दिलाकर शांत करता है कि उनका वर्तमान कष्ट एक धार्मिक परीक्षण है और उन्हें भविष्य में पुरस्कृत किया जाएगा, जिससे वे पूंजीवादी व्यवस्था को चुनौती न दें।
  • सामाजिक परिवर्तन में बाधा: मार्क्स का मानना था कि जब तक धर्म का प्रभाव रहेगा, तब तक वास्तविक सामाजिक परिवर्तन और सर्वहारा वर्ग की मुक्ति संभव नहीं है। धर्म को समाप्त करके ही लोग अपनी वास्तविक स्थिति को पहचान पाएंगे और शोषण से मुक्ति के लिए संघर्ष करेंगे।

मार्क्स का दृष्टिकोण धर्म को एक विचारधारा के रूप में देखता है जो सामाजिक असमानता को वैध बनाती है।

3. मैक्स वेबर (Max Weber): वेबर ने धर्म के सामाजिक प्रभावों को स्वीकार किया, लेकिन मार्क्स के विपरीत, उन्होंने धर्म को केवल दमनकारी शक्ति के रूप में नहीं देखा। उन्होंने तर्क दिया कि धर्म सामाजिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली कारक हो सकता है।

  • "प्रोटेस्टेंट एथिक और पूंजीवाद की भावना" (The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism): वेबर की यह कृति उनके दृष्टिकोण का केंद्रीय बिंदु है। उन्होंने तर्क दिया कि प्रोटेस्टेंट धर्म की कुछ शाखाओं, विशेष रूप से कैल्विनवाद, के विश्वासों ने आधुनिक पूंजीवाद के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • आकलन का सिद्धांत (Doctrine of Predestination): कैल्विनवादियों का मानना था कि मोक्ष पूर्वनिर्धारित है और ईश्वर ने पहले ही तय कर लिया है कि कौन स्वर्ग जाएगा और कौन नहीं। इस अनिश्चितता ने लोगों को "दुनिया में तपस्या" (asceticism in the world) का जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।
  • दुनिया में तपस्या और व्यवसायिक नैतिकता: कैल्विनवादियों ने कड़ी मेहनत, मितव्ययिता, निवेश और धन संचय को धार्मिक कर्तव्य के रूप में देखा। वे मानते थे कि व्यापार में सफलता ईश्वर की कृपा का संकेत है। इस प्रकार, धार्मिक प्रेरणाओं ने एक ऐसी मानसिकता को बढ़ावा दिया जो पूंजीवादी उद्यम और आर्थिक विकास के लिए अनुकूल थी।
  • धार्मिक विचार और सामाजिक क्रिया: वेबर ने दिखाया कि धार्मिक विचार व्यक्तियों के व्यवहार और सामाजिक संरचनाओं को कैसे आकार दे सकते हैं। उनके लिए, धर्म केवल एक प्रतिबिंब नहीं था, बल्कि एक सक्रिय शक्ति थी जो सामाजिक और आर्थिक प्रणालियों को प्रभावित करती थी।

वेबर ने धर्म और समाज के बीच एक जटिल और द्विदिश संबंध पर जोर दिया।

आधुनिक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण:

क्लासिक दृष्टिकोणों के अलावा, आधुनिक समाजशास्त्रियों ने धर्म के अध्ययन में नए आयाम जोड़े हैं:

  • धर्मनिरपेक्षीकरण (Secularization): यह सिद्धांत बताता है कि आधुनिक समाजों में धर्म का प्रभाव कम हो रहा है, क्योंकि विज्ञान और तर्क अधिक प्रमुख हो गए हैं। हालांकि, इस सिद्धांत पर बहस जारी है, क्योंकि कई समाजों में धर्म अभी भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • धार्मिक बहुलवाद (Religious Pluralism): समकालीन समाजों में विभिन्न धर्मों और धार्मिक संप्रदायों का सह-अस्तित्व देखा जाता है, जिससे धार्मिक सहिष्णुता और कभी-कभी संघर्ष भी उत्पन्न होता है।
  • धार्मिक पुनरुत्थानवाद (Religious Revivalism): कुछ क्षेत्रों में धार्मिकता में कमी के बजाय, धार्मिक उत्साह और रूढ़िवादी आंदोलनों का पुनरुत्थान देखा गया है, जो भू-राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित कर रहे हैं।
  • नए धार्मिक आंदोलन (New Religious Movements - NRMs): आधुनिक समाजों में नए धार्मिक समूहों का उदय हुआ है जो पारंपरिक धर्मों से भिन्न हो सकते हैं।
  • धर्म और पहचान: धर्म व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से प्रवासी समुदायों में।

निष्कर्ष:

धर्म पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण बहुआयामी है, जो धर्म को केवल व्यक्तिगत विश्वास के रूप में नहीं, बल्कि एक जटिल सामाजिक घटना के रूप में देखता है। दुर्खीम ने इसे सामाजिक एकजुटता के स्रोत के रूप में, मार्क्स ने इसे सामाजिक नियंत्रण के उपकरण के रूप में, और वेबर ने इसे सामाजिक परिवर्तन के एक संभावित चालक के रूप में देखा। आधुनिक समाजशास्त्रियों ने धर्मनिरपेक्षीकरण, धार्मिक बहुलवाद और पहचान निर्माण जैसे पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया है। ये सभी दृष्टिकोण सामूहिक रूप से हमें यह समझने में मदद करते हैं कि धर्म ने मानव समाजों को कैसे आकार दिया है और भविष्य में भी कैसे आकार देता रहेगा। यह सामाजिक व्यवस्था, संघर्ष, परिवर्तन और व्यक्तिगत अनुभवों को समझने के लिए एक आवश्यक लेंस प्रदान करता है।

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