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भारत में नगरीय अनौपचारिक क्षेत्रक के प्रमुख आयामों का वर्णन कीजिए।

भारत में नगरीय अनौपचारिक क्षेत्रक (Urban Informal Sector) नगरीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण और विशाल हिस्सा है, जो लाखों लोगों को रोजगार और आजीविका प्रदान करता है, विशेषकर उन लोगों को जो औपचारिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। अनौपचारिक क्षेत्रक में वे आर्थिक गतिविधियाँ शामिल हैं जो सरकार द्वारा विनियमित या कर योग्य नहीं होती हैं, और जिनमें अक्सर छोटे पैमाने पर उद्यम, कम पूँजी निवेश, श्रम-प्रधान उत्पादन और श्रमिक सुरक्षा की कमी होती है। इसके प्रमुख आयामों को समझना भारत के नगरीय परिदृश्य को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1. रोजगार और आजीविका का स्रोत:

  • विशाल कार्यबल: अनौपचारिक क्षेत्रक भारत के नगरीय कार्यबल के एक बड़े हिस्से को समाहित करता है। अनुमान है कि नगरीय क्षेत्रों में अधिकांश रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं। यह उन ग्रामीण प्रवासियों, अशिक्षित या कम शिक्षित व्यक्तियों, और वंचित सामाजिक समूहों (जैसे दलित, आदिवासी और महिलाएं) के लिए एक प्राथमिक आजीविका स्रोत है जो औपचारिक क्षेत्र की नौकरियों तक पहुंच नहीं बना पाते।
  • विविध गतिविधियाँ: इसमें सड़क किनारे विक्रेता (सब्जी, फल, चाय), छोटे कारीगर (मोची, दर्जी, कुम्हार), कचरा बीनने वाले, घरेलू सहायक, निर्माण श्रमिक, छोटा-मोटा परिवहन (रिक्शा चालक, ऑटो-रिक्शा चालक), फेरीवाले, और छोटे पैमाने के विनिर्माण और मरम्मत की दुकानें शामिल हैं।

2. विनियमन और कानूनी स्थिति का अभाव:

  • अनैच्छिक और अनियंत्रित: अनौपचारिक क्षेत्रक की सबसे परिभाषित विशेषता यह है कि यह सरकारी नियमों, करों और श्रम कानूनों से बाहर होता है। श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा लाभ (जैसे पेंशन, स्वास्थ्य बीमा), कार्यस्थल सुरक्षा या नौकरी की सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता।
  • वैधता की ग्रे ज़ोन: अनौपचारिक क्षेत्रक की कई गतिविधियाँ कानूनी रूप से वैध होती हैं (जैसे सड़क किनारे बेचना), लेकिन वे विनियमित नहीं होतीं। वहीं कुछ गतिविधियाँ आंशिक रूप से या पूरी तरह से अवैध भी हो सकती हैं (जैसे बिना लाइसेंस के बेचना या अवैध निर्माण)।

3. कम पूँजी और श्रम-प्रधान प्रकृति:

  • अल्प पूँजी निवेश: अनौपचारिक क्षेत्रक के उद्यमों को शुरू करने के लिए बहुत कम पूंजी की आवश्यकता होती है। यह उन गरीब व्यक्तियों के लिए इसे सुलभ बनाता है जिनके पास औपचारिक ऋण तक पहुंच नहीं है।
  • श्रम-प्रधान: ये गतिविधियाँ अक्सर अत्यधिक श्रम-प्रधान होती हैं और आधुनिक मशीनरी या प्रौद्योगिकी पर कम निर्भर करती हैं। यह बड़ी संख्या में अकुशल या अर्ध-कुशल श्रमिकों को समायोजित करने में मदद करता है।

4. सामाजिक भेद्यता और असमानता:

  • असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियाँ: अनौपचारिक क्षेत्रक में काम करने वाले श्रमिकों को अक्सर लंबे समय तक काम करना पड़ता है, मजदूरी कम होती है, और उन्हें कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है। कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य मानदंड अक्सर उपेक्षित होते हैं।
  • सामाजिक सुरक्षा का अभाव: सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का अभाव इन श्रमिकों को बीमारी, दुर्घटनाओं या वृद्धावस्था के दौरान अत्यधिक असुरक्षित बनाता है।
  • महिलाओं और बच्चों की भागीदारी: महिलाएँ और बच्चे अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र में अत्यधिक प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ उन्हें पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है और वे शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।

5. नगरीय अर्थव्यवस्था में योगदान:

  • माल और सेवाओं का प्रावधान: अनौपचारिक क्षेत्रक नगरीय गरीबों के लिए सस्ती दरों पर आवश्यक माल और सेवाएँ प्रदान करता है, जिनकी पहुंच अक्सर औपचारिक क्षेत्र के महंगे उत्पादों तक नहीं होती।
  • आय सृजन: यह नगरीय गरीबों के लिए आय सृजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता है।
  • पुनर्चक्रण और अपशिष्ट प्रबंधन: कचरा बीनने वाले और पुनर्चक्रणकर्ता अनौपचारिक क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो नगरीय अपशिष्ट प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे पर्यावरणीय लाभ भी होते हैं।

6. गतिशील और लचीला:

  • अनुकूलनशीलता: अनौपचारिक क्षेत्रक अत्यधिक गतिशील और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के प्रति लचीला होता है। यह आर्थिक झटकों के दौरान एक बफर के रूप में कार्य कर सकता है, जब औपचारिक क्षेत्र में नौकरियां कम होती हैं।
  • नवाचार: छोटे पैमाने पर उद्यमी अक्सर सीमित संसाधनों के साथ नए उत्पादों और सेवाओं को विकसित करने में नवाचार करते हैं।

7. सरकार और नीतिगत चुनौतियाँ:

  • पहचान की समस्या: अनौपचारिक क्षेत्र की प्रकृति के कारण, सरकार के लिए इसका सटीक आकार और संरचना निर्धारित करना मुश्किल होता है।
  • नीतिगत द्वंद्व: सरकारें अक्सर अनौपचारिक क्षेत्र को एक समस्या के रूप में देखती हैं जिसे समाप्त किया जाना चाहिए (विनिमय, कर संग्रह के संदर्भ में), लेकिन साथ ही यह लाखों लोगों के लिए एक जीवन रेखा भी है।
  • औपचारिकरण के प्रयास: कई देशों ने अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाने की कोशिश की है, लेकिन ये प्रयास अक्सर श्रमिकों को औपचारिक क्षेत्र में धकेलने के बजाय उन्हें हाशिए पर धकेल सकते हैं यदि उचित समर्थन और प्रोत्साहन प्रदान नहीं किया जाता है।

निष्कर्ष: भारत में नगरीय अनौपचारिक क्षेत्रक नगरीय परिदृश्य का एक अभिन्न अंग है, जो लाखों लोगों के लिए रोजगार और आजीविका प्रदान करता है और नगरीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। हालांकि यह क्षेत्र सामाजिक भेद्यता, असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों और विनियमन की कमी से ग्रस्त है, यह अत्यधिक लचीला और गतिशील भी है। इसके आयामों को समझना भारत में समावेशी नगरीय विकास नीतियों को तैयार करने, गरीबी को कम करने और नगरीय गरीबों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए आवश्यक है। केवल इस क्षेत्र को समाप्त करने की कोशिश करने के बजाय, नीति निर्माताओं को इसके श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने और इसे अधिक समावेशी और उत्पादक बनाने के तरीकों की तलाश करनी चाहिए।

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